परमेश्वर को प्रथम स्थान दें
"परन्तु पहले परमेश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज करो, तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएँगी।" - मत्ती 6:33
यह यीशु मसीह का केवल एक प्रेरणादायक वचन नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मसीही जीवन का आधारभूत सिद्धांत है। यह हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है - मेरी सर्वोच्च प्राथमिकता कौन है?
बहुत-से लोग परमेश्वर पर विश्वास तो करते हैं, परन्तु उसे अपने जीवन में प्रथम स्थान नहीं देते। वे आराधना करते हैं, प्रार्थना करते हैं और स्वयं को मसीही कहते हैं, किन्तु उनके निर्णय, जीवन-शैली और प्राथमिकताएँ संसार के लोगों से भिन्न दिखाई नहीं देतीं। परिणामस्वरूप उनके जीवन में वह आत्मिक प्रभाव, शांति और परमेश्वर की महिमा प्रकट नहीं होती, जो उसके वाचा-बद्ध लोगों में दिखाई देनी चाहिए।
मसीही और अविश्वासी के बीच सबसे बड़ा अंतर केवल उनकी पहचान में नहीं, बल्कि उनकी प्राथमिकताओं में होना चाहिए। संसार के लोग अपनी सुरक्षा धन, पद, योग्यता और योजनाओं में खोजते हैं, जबकि परमेश्वर की संतान अपने जीवन का आधार उसके राज्य और उसकी धार्मिकता को बनाती है।
परमेश्वर की प्रतिज्ञा
मत्ती 6 में यीशु पहले मनुष्य की सामान्य चिंताओं का उल्लेख करते हैं - भोजन, वस्त्र, भविष्य और दैनिक आवश्यकताएँ। फिर वे कहते हैं,
"ये सब वस्तुएँ अन्यजाति लोग खोजते हैं; और तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है कि तुम्हें इन सब वस्तुओं की आवश्यकता है।" (मत्ती 6:32)
इसके बाद वे एक अद्भुत प्रतिज्ञा देते हैं -
"परन्तु पहले परमेश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज करो, तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएँगी।" (मत्ती 6:33)
यहाँ यीशु हमें चिंता छोड़ने का नहीं, बल्कि प्राथमिकता बदलने का निमंत्रण देते हैं। जब हमारा ध्यान "वस्तुओं" से हटकर "परमेश्वर के राज्य" पर केंद्रित हो जाता है, तब परमेश्वर स्वयं हमारी आवश्यकताओं की जिम्मेदारी लेता है।
परमेश्वर के राज्य की खोज का अर्थ
परमेश्वर के राज्य की खोज केवल रविवार को आराधना में उपस्थित होने या धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परमेश्वर की प्रभुता को स्वीकार करना।
इसका अर्थ है -
प्रत्येक निर्णय से पहले यह पूछना - "प्रभु, आपकी इच्छा क्या है?"
अपने समय, प्रतिभा, परिवार, व्यवसाय और भविष्य को परमेश्वर के अधीन रखना।
सत्य, ईमानदारी, न्याय, करुणा और पवित्रता को लाभ से अधिक महत्व देना।
ऐसे निर्णय लेना जो परमेश्वर को प्रसन्न करें, चाहे वे तत्काल आर्थिक या सामाजिक लाभ न दें।
जब यह दृष्टिकोण हमारे जीवन का हिस्सा बन जाता है, तब हम समझने लगते हैं कि हमारी वास्तविक सुरक्षा हमारी नौकरी, आय या संपत्ति में नहीं, बल्कि स्वयं परमेश्वर में है।
परमेश्वर हमारी आवश्यकताओं का स्रोत है
परमेश्वर केवल हमारा उद्धारकर्ता ही नहीं, बल्कि हमारा पालनहार भी है। वह अपनी सन्तानों की आवश्यकताओं को जानता है और उचित समय पर उनकी पूर्ति करता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि विश्वासी व्यक्ति कभी परिश्रम नहीं करेगा। बाइबल परिश्रम, बुद्धिमानी और उत्तरदायित्व का समर्थन करती है। परन्तु विश्वासी यह भी जानता है कि उसका अंतिम भरोसा उसके परिश्रम पर नहीं, बल्कि परमेश्वर की कृपा और आशीष पर है।
जब हम स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर ही हमारा स्रोत है, तब चिंता का स्थान विश्वास ले लेता है, और भय का स्थान शांति।
वित्तीय जीवन में परमेश्वर को प्रथम स्थान देना
परमेश्वर को प्रथम स्थान देना हमारे आर्थिक जीवन में भी दिखाई देना चाहिए। जब हम आनंद और विश्वास के साथ दशमांश, भेंट, दान और ज़रूरतमंदों की सहायता करते हैं, तब हम यह स्वीकार करते हैं कि हमारी सुरक्षा धन में नहीं, बल्कि परमेश्वर में है।
उदारता केवल आर्थिक कार्य नहीं, बल्कि विश्वास की अभिव्यक्ति है। परमेश्वर ऐसे हृदय को सम्मान देता है जो विश्वास के साथ देता है और उसके राज्य के विस्तार में सहभागी बनता है।
भय से विश्वास की ओर
जब पवित्र आत्मा हमारे हृदय में यह सत्य प्रकट करता है कि परमेश्वर हमारी देखभाल करेगा, तब धीरे-धीरे भय, लालच और भविष्य की चिंता समाप्त होने लगती है।
हम देना सीखते हैं।
हम आज्ञाकारिता में विलंब नहीं करते।
हम परिस्थितियों से अधिक परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करना सीखते हैं।
तब हमारा जीवन इस विश्वास का प्रमाण बन जाता है कि हमारा स्वर्गीय पिता हमारी प्रत्येक आवश्यकता को जानता है।
परमेश्वर को प्रथम स्थान देने के व्यावहारिक उपाय
प्रतिदिन का आरंभ परमेश्वर के साथ समय बिताकर करें।
किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले प्रार्थना और बाइबल के सिद्धांतों के अनुसार मार्गदर्शन खोजें।
अपने समय, धन और प्रतिभाओं का उपयोग परमेश्वर की महिमा के लिए करें।
लाभ के लिए कभी सत्य और धार्मिकता से समझौता न करें।
अपने परिवार में परमेश्वर के वचन और प्रार्थना को प्राथमिकता दें।
अपनी योजनाओं से पहले परमेश्वर की इच्छा को महत्व दें।
हर परिस्थिति में यह विश्वास रखें कि परमेश्वर आपकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में विश्वासयोग्य है।
निष्कर्ष
परमेश्वर को प्रथम स्थान देना केवल एक आध्यात्मिक सलाह नहीं, बल्कि एक जीवन-शैली है। जब हम अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र - समय, धन, परिवार, सेवकाई, कार्य और भविष्य - में परमेश्वर को सर्वोच्च स्थान देते हैं, तब हमारा जीवन उसकी उपस्थिति, उसकी शांति और उसकी देखभाल का जीवित प्रमाण बन जाता है।
तब लोग हमारे जीवन में वह अंतर देखते हैं जो केवल मानवीय प्रयासों से नहीं, बल्कि परमेश्वर के राज्य को प्राथमिकता देने से उत्पन्न होता है। वे हमारे भीतर स्थिरता, संतोष और आशा को देखकर पूछते हैं, "तुम्हारे जीवन में यह शांति कहाँ से आती है?" और हम विश्वास के साथ उत्तर दे सकते हैं - "मैंने पहले परमेश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज करना सीखा है; इसलिए मेरा स्वर्गीय पिता मेरी आवश्यकताओं की चिंता करता है।"
आइए आज हम यह दृढ़ निश्चय करें -
"हे प्रभु, मैं अपने जीवन के हर क्षेत्र में आपको प्रथम स्थान दूँगा। मेरी सोच, मेरे निर्णय, मेरा समय, मेरा धन, मेरा परिवार और मेरी सेवकाई - सब कुछ आपकी महिमा के लिए हो।"जब हम इस प्रतिज्ञा के अनुसार जीवन जीते हैं, तब हम अनुभव करते हैं कि परमेश्वर वास्तव में विश्वासयोग्य है। वह अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है, अपनी सन्तानों की देखभाल करता है, और उन्हें ऐसा जीवन देता है जो उसकी महिमा का साक्षी बन जाता है।
प्रार्थना
"हे स्वर्गीय पिता, मैं स्वीकार करता हूँ कि कई बार मैंने अपनी चिंताओं, योजनाओं और इच्छाओं को आपसे अधिक महत्व दिया। आज मैं अपने जीवन का प्रत्येक क्षेत्र आपके हाथों में समर्पित करता हूँ। मुझे सामर्थ्य दीजिए कि मैं हर निर्णय में पहले आपके राज्य और आपकी धार्मिकता की खोज करूँ। मेरा विश्वास दृढ़ कीजिए, मेरे भय को दूर कीजिए, और मुझे ऐसा जीवन जीने योग्य बनाइए जो आपकी महिमा प्रकट करे। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।"

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