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Showing posts with the label इक्लीसिया से मिलिये अपने ही घर में

सताव (उत्पीड़न)

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  केवल सताए गए (उत्पीड़ित) विश्वासी ही स्वर्ग पहुंचेंगेः यूहन्ना ने स्वर्ग में, हर एक देश हर एक कुल और भाषा के लोगों की एक बहुत बड़ी भीड़ को दखा जो श्वेत वस्त्र पहिने हुए थी और परमेश्वर की महिमा कर रही थी। एक प्राचीन ने उससे कहा कि वे लोग महाक्लेश में से निकलकर आए हैं और इसी कारण वे परमेश्वर के सिंहासन के साम्हने हैं और दिन और रात उसकी सेवा करते हैं ( प्रकाशित वाक्य 7ः9,10 )।  सताव की गारन्टी दी गई हैः यदि आपका सताव नहीं हो रहा है तो आपको चिन्ता करने की जरूरत है क्योंकि आप शैतान के राज्य को पर्याप्त हानि नहीं पहुंचा रहे हैं जिससे वह आपकी ओर ध्यान दे। इसका यह अर्थ नहीं है कि आप मुसीबत मोल लें, परन्तु धर्मशास्त्र बड़ी स्पष्टता के साथ कहती है कि, ‘‘जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं, से सब सताए जाएंगे ( 2तीमुथियुस 3ः12 )। प्रभु हमें आश्वासित करते है कि, ‘‘यदि उन्होंने मुझे सताया तो तुम्हें भी सताएंगे’’ ( यूहन्ना 15ः18-20 ) जब पौलूस इक्लीसिया को सता रहा था, प्रभु ने उससे कहे थे, ‘‘शाऊल तू मुझे क्यों सताता है? ‘‘जब आप सताए जाते तो हमेशा याद रखिये कि वह आप नहीं हैं...

अच्छी कुश्ती लड़ो

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  अच्छी कुश्ती लड़ो बहुत सी इक्लीसियाओं की स्थापना, भंयकर अत्मिक युद्धों को लड़ने के बाद ही, की जा सकती थी। यीशु शैतान के कामों का नाश करने के लिये जगत में आए थे। उन्होंने हमें आत्मा की तलवार दिये हैं ताकि हम शैतान के प्रतिनिधियों के विरूद्ध वैश्विक युद्ध को लड़ सकें ( प्रेरितों के काम 13ः6-12 )।  कुरिन्थि में यह वीनस और डेल्फी की कामवासना से भरी आत्मा थी जो उन्हें व्याभिचारीपन की अनैतिकता और मूर्तिपूजा में ले गई ( 1कुरिन्थियों 6ः9; 10ः19-21 )। इफिसुस में वह अरितिमिस की आत्मा थी जो आपोलो द्वारा प्रेरित थी जिसकी उपासना पैयथो में की जाती थी ( प्रेरितों के काम 16ः16 )। अन्ताकिया में यह कर्मकाण्ड वादी आत्मा थी, उन यहूदी मत के लोगों की जो मसीह पर विश्वास करते तो थे परन्तु जो खतना कराने, और मूसा की व्यवस्था की और दूसरी बातों को पूरा करने के लिये दबाव भी डालते थे ( प्रेरितों के काम 15ः1,2 )।  स्मुरना में यह शैतान की साभा थी ( प्रकाशित वाक्य 2ः9 )। परगुमन में यह बालाम की और नीकुलईयों की शिक्षाओं के समझौते कर लेने वाली आत्मा है ( प्रकाशित वाक्य 2ः6,14,15 )। थुआतीरा में यह ईजबेल की आत...

पौलूस के तरीके

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 पौलूस के  तौर  तरीके  पौलूस भाषा और धर्मशास्त्र ज्ञान के साथ सुसज्जित थाः प्ररित पौलूस सब समयों का सबसे बड़ा धर्म सेवक (मिशनरी) हुआ है। उसके तरीके और नमूने जिन्हें उसने ठहराया है, आदर्श हैं, जो अनुकरणीय हैं। पौलूस के समय से, विश्व सुसमाचार कार्य हेतु सौकड़ों बड़ी बड़ी योजनाएं और कार्यक्रम हुए हैं परन्तु कोई भी सफल नहीं हुए। इसलिये हमें उस पुरूष और उसके तरीकों के विषय में गम्भीरता से देखने की आवश्यक्ता है। पौलूस एक यूनानी भाषा बोलने वाले नगर किलकिया में पाला पोसा व बड़ा था और वह यूनानी तथा इब्रानी दोनों ही भाषाओं को बालता था। बाद में उसने गमलीएल के आधीन वि़द्या प्राप्त की और धर्मशास्त्र अध्ययन में प्रवीणता प्राप्त की ( प्रेरितों के काम 22ः3 )। ये दोनों भाषाएं उसके लिये वरदान साबित हुई और उसमें कभी भी किसी और दूसरी भाषा में बोलने या अनुवाद करने की कोशिश नहीं की, यहां तक कि लेटिन भाषा में भी नहीं, जो उस समय की सरकार की भाषा थी।  पौलूस एक उत्साही पुरूष था जिसने क्लेश सहाः पौलूस परमेश्वर के राज्य को सब जगह स्थापित हुआ देखने की लालसा से भरा हुआ था, और इसे पूरा करने के ल...

मानव संसाधन प्रबंधन के लिये यीशु का तरीका

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मिशन या उद्देश्य की घोषणाः एक चर्च या कलीसिया जो अपने उद्देश्य/अभिप्राय को नहीं पहिचानती और उसे स्पष्ट शब्दों में परिभाषित नहीं करती, वह अभिप्राय रहित कलीसिया है। अपनी सेवकाई के बिलकुल प्रारम्भ में ही यीशु ने सार्वजनिक रीति से अपने मिशन/उद्देश्य की घोषणा कर दिये थे। उन्हें यहां अत्याचार से दबे लोगों को स्वतंन्त्र करने और आत्मिक रूप से अंधों को सुसमाचार के द्वारा दृष्टि प्रदान करके पूरे विश्व को बदलने के लिये विशेष प्रतिभाशाली व्यक्तियों की आवश्यक्ता थी। ( लूका 4ः18,19; रोमियों 12ः2 )  विश्व बदलने वालों के लिये प्रतिभाशाली व्यक्तियों की खोजः व्यापारिक लोग अपने कार्य के लिये बहुत प्रतिभाशाली व्यक्तियों की भरती करते हैं। कोई अगुवा अपनी कम्पनी के लिये यदि कोई बड़ा महत्वपूर्ण काम कर सकता है तो वह यह होगा कि वह उसमें सबसे अच्छे प्रबन्धन स्कूल से प्रशिक्षित व्यक्तियों को भरती कर दे। यहूदी लोग विश्व के सबसे पढ़े लिखे लोग थे। 2000 वर्ष पूर्व भी उनमें साक्षरता की दर लगभग 100 प्रतिशत थी, क्योंकि प्रत्येक यहूदी बच्चे को मदरसा जाना पड़ता था जहां रब्बी उन्हें पढ़ाना लिखना सिखाते थे। यहूदी लोग...

प्रार्थना करनेवाली इक्लीसिया

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प्रार्थना करो, घोषणा करो और अधिकार (कब्जा) करलोः परमेश्वर ने आज्ञा दिये हैं, ‘‘यदि मेरे लोग प्रार्थना करें, तो मैं उनके देश को ज्यों का त्यों (चंगा) कर दूंगा’’ ( 2इतिहास 7ः14) । यीशु ने पुनः इस बात को दृढ़ किये कि, ‘‘मेरा घर जातियों के लिये प्रार्थना का घर कहलाएगा’’ ( मरकुस 11ः17 )। उन्होेंने इतनी लौ लगाकर प्रार्थना किये कि उनका पसीना, खून के समान बन गया। पतरस ने घोषणा किये थे कि उनकी मुख्य सेवकाई प्रार्थना करना और वचन अध्ययन होगा ( प्रेरितों के काम 6ः4 )। पौलूस ने लोगों के लिये, मां की तरह जच्चा की सी पीड़ाएं सहा, जब तक कि उनमें मसीह का स्वरूप नहीं बन गया ( गलतियों 4ः19 )। उसने हमसे कहा है, निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो ( 1थिस्सलुनीकियों 5ः17 )। हम सब जानते हैं कि धर्मीजन की लौ लगाकर की जाने वाली सरगर्म प्रार्थना प्रभावी होती है, और बहुत कुछ प्राप्त कर सकती है ( याकूब 5ः16 )। क्योंकि नये नियम की इक्लीसिया बहुत अधिक सताई जा रही थी, उसने अपना अधिक से अधिक समय गिड़गिड़ाहट से भरी प्रार्थनाओं में बिताया, और जब वे प्रार्थना कर रहे थे बहुत से लोग उनमें आ मिले और इक्लीसिया बहुत तेजी से बढ़ती गई (...