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वचन मन में रखना आत्मिक जीवन की शक्ति: भजन 119:11 - मैंने तेरे वचन को अपने हृदय में रख छोड़ा है।

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1. वचन मन में रखना  एक बहन बाइबिल के सामने आँखें बंद कर प्रार्थना में, हाथ हृदय पर, हृदय से प्रकाश निकल रहा है - वचन हृदय में बस रहा है - बाइबिल खुली है, नोट्स लिखे हैं, ऊपर लिखा "I have hidden your word in my heart that I might not sin against you - Psalm 119:11"। यही आत्मिक शक्ति - वचन हाथ में नहीं, हृदय में। बाइबल उद्धरण: "तेरे वचन को मैं ने अपने हृदय में छिपा लिया है, कि तुझ से पाप न करूँ।" (भजन संहिता 119:11)​ परिचय - सबसे बड़ा खजाना कहाँ? भजन 119 बाइबिल का सबसे बड़ा अध्याय - 176 आयतें, हर आयत वचन के बारे में। और बीच में दिल की बात - 119:11 - दाऊद कहता है मैंने वचन को बैंक लॉकर में नहीं, हृदय में रखा। क्यों? क्योंकि आत्मिक जीवन की शक्ति वचन मन में रखने में है, बाइबिल अलमारी में रखने में नहीं।परमेश्वर का वचन हमारे हृदय और मन में धारण करने से आत्मिक शक्ति प्राप्त होती है, जो जीवन की हर चुनौती में मार्गदर्शन देता है। लूका 2:19 के अनुसार, "परन्तु मरियम ने ये सारी बातें अपने हृदय में रखीं, और उनके विषय में चिन्तन करती रहीं।" यह कवर हमें सिखाता है कि वचन को...

पहले मनुष्य को बनाने में परमेश्वर की 5 इच्छाएं - उत्पत्ति 1:26-28 का गहरा रहस्य

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परमेश्वर को मनुष्य की जरूरत नहीं थी, फिर क्यों बनाया? (प्रेरित 17:25) परिचय: परमेश्वर को मनुष्य की जरूरत नहीं थी, फिर क्यों बनाया? (प्रेरित 17:25) परमेश्वर ने जब मनुष्य की रचना की, तब उसकी मूल इच्छा प्रेम, संगति और प्रभुत्व का जीवन था । मनुष्य को परमेश्वर के स्वरूप और सदृश्य में बनाया गया ताकि वह परमेश्वर के साथ संगति में रहे और उसकी इच्छा को पृथ्वी पर पूरा करे । परमेश्वर ने आदम को क्यों बनाया? केवल जीने के लिए नहीं। जानिए उत्पत्ति 1:26-28 के अनुसार परमेश्वर की 5 अनंत इच्छाएं - स्वरूप, संगति, अधिकार, महिमा और परिवार - जो आज भी आपके जीवन का उद्देश्य है। बाइबल कहती है: उत्पत्ति 1:26–27 “तब परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपनी छवि पर, अपनी समानता में बनाएं, और वे समुद्र की मछलियों, आकाश के पक्षियों, पशुओं, सारी पृथ्वी, और हर रेंगनेवाली वस्तु पर अधिकार रखें और परमेश्वर ने मनुष्य को अपनी ही छवि पर उत्पन्न किया ।” परमेश्वर ने आदम को क्यों बनाया? केवल जीने के लिए नहीं। जानिए उत्पत्ति 1:26-28 के अनुसार परमेश्वर की 5 अनंत इच्छाएं - स्वरूप, संगति, अधिकार, महिमा और परिवार - जो आज भी आपके ज...

महामारी काल में कलीसिया की भूमिका: जब चर्च बंद थे, तब असली कलीसिया जागी थी।

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कोरोना वायरस में जिस तरह से हम रहते है, चलते हैं और हमारे रहन सहन का अस्तित्व है, सब कुछ बदल दिया है। (प्रेरितों के काम 17:28)। राजनीति, शासन, प्रशासन, न्यायपालिका, मीडिया, शिक्षा प्रणाली, स्वास्थ्य प्रणाली, हमारे काम करने और परिवार का समय बिताने का तरीका, यहां तक कि हमारे खाने पीने और हम अपने मित्रों के साथ कैसे व्यवहार करते हैं, सभी में भारी बदलाव आया है। यह समझने के लिए कि ‘‘चर्च युग’का अन्त का समय आ गया है और अब परमेश्वर लोगों के दिलों और घर वापसी कर रहें है इस के लिए हमें भविष्यवक्ता या बाइबल का ज्ञाता होने की आवश्यक्ता नहीं है। लड़ाइयां, बाढ़, अकाल और आग, तूफान, बवंडर, भूकंप और महामारी अतीत में भी हो चुके हैं, लेकिन वैश्विक स्तर पर पहले इस तादाद और इस कदर के नुक्सान के साथ कभी नहीं आये। क्या महामारी में कलीसिया सिर्फ Online Sermon तक सीमित थी? नहीं। जानिए कैसे प्रेरितों की कलीसिया ने अकाल में सेवा की (प्रेरित 11:29) और आज की कलीसिया को महामारी में क्या करना चाहिए - 5 प्रैक्टिकल भूमिकाएँ। हम जानते हैं कि सर्वनाश हमें घूर रहा है। पृथ्वी के चारों कोनों में प्रवासी इस्रायली लगभग 20...

SOME ESSENTIAL DIFFERENCES BETWEEN THE INSTITUTIONAL CHURCH AND THE ORGANIC CHURCH - (Eph. 1:22,23)

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Left - Institutional: Building-Centered, Hierarchy (Pastor > Staff > Congregation), Program Schedule, Formal Structure. Right - Organic: House, Body of Christ, Relational, Family Circle, Tree with deep roots. ·   Christ is the head of an Organic church . (Eph. 1:22,23) Clergy is the leader of an Institutional church. ·  The Organic church is made up with living stones. (1Peter 2:5) The Institutional church is made up from brick, mortar and dead stones. ·   In the Organic church Fivefold ministry gifted elders speak to the heart and teach obedience and equip the saints for the work of the ministry. (Eph. 4:11,12) In the Institutional church Clergy only speak to the head to educate them with more knowledge but nothing to implement. ·   The Organic church is participative, where the Holy Spirit guides the dialogue and the interaction. (1 Cor. 14:26; John 14:26) In the Institutional church is monologue based where Clergy is the sole interpr...