कलीसिया (चर्च) में मूर्तिपूजक परम्परांए एंव विधर्म - सिनेगॉग - भाग 22
पवित्र भवन, ऊंचे घण्टाघर, क्रूस, रवि-वार (सन-डे), यहां तक कि प्रभु यीशु (लॉर्ड जीसस) और बहुत सी बातें हमारी मूर्तिपूजक विधर्मिता की बपौती हैं। इक्लीसिया का प्रतिक चिन्ह दीवट (मेनोराह) ही है। ( प्रकाशित वाक्य 1ः20 ) सिनेगॉग: सिनेगॉग का अर्थ कोई भवन नहीं है। यह कम से कम दस यहूदियों की मण्डली या असैम्बली है। वे इससे कम संख्या में भी इकट्ठे हो सकते हैं किन्तु ऐसी स्थिती में वे कुछ निर्णय नहीं ले सकते थे, जैस किसी रब्बी को तनख्वाह पर रखना। वे सब्त के दिन केवल आराधना नहीं करते थे, परन्तु प्रतिदिन प्रार्थना के लिये जमा होते थे, तोराह (आदेशों और हिदायतों) और भविष्यद्धक्ताओं की पुस्तकों में से सिखाने के लिये, संवाद करने, उत्सवी भोजन करने, प्राणों को दुखित करने, भजन करने और नाचने इत्यादि के लिये जमा होते थे। यह पूरी जाति के लिये, यहूदियों के जीवन को प्रतिबिम्बत करता था। वे सुबह की प्रार्थना के लिये जमा होते थे जिसे शाहारित कहते थे। और शाम की प्रार्थना को माखि और दोपहर की प्रार्थना को मिन्हाह कहते थे। वे उन लोगों के लिये लगातार प्रार्थना करते थे जो अब तक याहवेह के नहीं ह...