ईश्वरीय चंगाई के विभिन्न चरण - 6
विश्वास इस बात पर विश्वास करना है, कि जो कुछ मैंने प्रार्थना में भाग है, वह मुझे मिल गया है। इसी को ‘‘विश्वास’’ कहते है। कई लोग बरसों से परमेश्वर की प्रतिज्ञा की हुई आशीषों के लिये प्रार्थना करते है, किन्तु जब तक वे उसे देख न लें या अनुभव न कर लें। यह विश्वास नहीं करते कि जो कुछ हमने मांगा है, वह हमें मिल गया है, यह तो विश्वास नहीं है। विश्वास का अर्थ है, कि जिस बात के लिये परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है, और आपने प्रार्थना की है, वह हो गई। इसके पहले कि आप उसे प्रत्यक्ष रूप से देखें या अनुभव करें। वह आपके मिल गई है। ‘‘ऐसा विश्वास केवल परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर ही आधारित है’’। यही पर आपको स्वाभाविक मन एंव आपका विश्वास, महानतम संघर्ष करते है। यही आपके तर्क (बुद्धि) एंव परमेश्वर के वचन का राणक्षेत्र है। आप आरोग्य के लिये प्रार्थना करते है। किन्तु कभी-कभी उत्तर तुरन्त नहीं मिलता है। प्रार्थना के बाद आप पीड़ा या बुखार का अनुभव करते है। परमेश्वर का वचन कहता है।’’ उसके कोड़े खाने से तुम चंगे हुए’’तर्क यह कहता है कि रोग अभी भी है। यदि पर आप को तर्क को छोड़ना है, और परमेश्वर के वचन पर ...