परमेश्वर को धन्यवाद का बलिदान चढ़ाना जीवन की सर्वोच्च आराधना
“ आध्यात्मिक चिंतन श्रृंखला” “ परमेश्वर को धन्यवाद ही का बलिदान चढ़ा , और परमप्रधान के लिये अपनी मन्नतें पूरी कर ।” (भजन संहिता 50:14) यह वचन केवल शब्दों की पुकार नहीं , बल्कि आत्मा की गहराई से निकला हुआ एक समर्पण है - ऐसा समर्पण जो सम्पूर्ण जीवन को आराधना का पात्र बना देता है । धन्यवाद केवल एक भावना नहीं , बल्कि हृदय की सच्ची भाषा है - वह दिव्य अभिव्यक्ति जिसके द्वारा मनुष्य अपने सृष्टिकर्ता के प्रति कृतज्ञता , प्रेम और आदर अर्पित करता है । धन्यवाद का बलिदान वह अमूल्य भेंट है जो मन , वचन और कर्म - तीनों से परमेश्वर की वेदी पर चढ़ती है । यह वह बलिदान है जो किसी पशु या वस्तु से नहीं , बल्कि हमारे भीतर के भाव और विश्वास से उत्पन्न होता है । यही वह भेंट है जो प्रभु को सबसे अधिक प्रिय है , क्योंकि यह हृदय की सच्चाई और विनम्रता से प्रस्फुटित होती है । “ सब बातों में हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से परम पिता परमेश्वर का धन्यवाद करते रहो ।” (इफिसियों 5:20) यह वचन हमें सिखाता है कि धन्यवाद केवल परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होना चाहिए , बल्कि यह हमारे विश्वास का स्वभाव होना चाहिए । एक...