पौलुस का दसवाँ पत्र - फिलेमोन में,
मुख्य वचन:
"यदि उसने तेरी कुछ हानि की हो, या उस पर तेरा कुछ आता हो, तो मेरे नाम पर लिख ले।" - (फिलेमोन 18),
1. पौलुस का दसवाँ पत्र कौन सा है?
यह पौलुस का दसवाँ पत्र है - फिलेमोन का पत्र। पिछले नौ पत्र थिस्सलुनीके (दो), गलातिया, कुरिन्थुस (दो), रोम, इफिसुस, फिलिप्पी और कुलुस्से को गए थे।
यह पत्र नए नियम का सबसे छोटा पत्र है, केवल 25 पद का, पर घरेलू कलीसिया के लिए इससे बड़ा पाठ शायद ही कोई हो। यह भी पौलुस ने कैद में रहते हुए लिखा (पद 1, 9-10), और इसे कुलुस्सियों के पत्र के साथ ही, उसी दूत तुखिकुस और उनेसिमुस के हाथ भेजा गया (कुलुस्सियों 4:9)।
कहानी यह है। फिलेमोन कुलुस्से का एक धनी विश्वासी था, जिसके घर में कलीसिया मिलती थी (पद 1-2)। उसका एक सेवक था, उनेसिमुस, जो उससे भागकर चला गया था, और शायद कुछ चुराकर भी (पद 18)। भागते-भागते वह रोम पहुँचा, जहाँ किसी तरह पौलुस से मिला और सुसमाचार सुनकर विश्वास में आ गया। पौलुस उसे "अपने बन्धनों में उत्पन्न हुआ मेरा पुत्र" कहता है (पद 10)।
अब पौलुस उसे वापस उसके स्वामी के पास भेज रहा है, पर एक चिट्ठी के साथ, जो एक भगोड़े सेवक के लिए सबसे बड़ी सिफारिश है। यह पत्र किसी सिद्धान्त की व्याख्या नहीं, एक निजी विनती है, जो पूरे घराने और उसकी कलीसिया के सामने पढ़ी जानी थी।
2. इस दसवें पत्र का मुख्य संदेश क्या है?
इस पत्र का एक ही प्रश्न है - जब सुसमाचार दो लोगों के बीच के असली रिश्ते को बदल देता है, तब हम एक-दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करें?
पौलुस इसका उत्तर 4 भागों में देता है:
अ) प्रेम की नींव पर विनती (पद 1-7)
पौलुस अपना परिचय "मसीह यीशु का बन्दी" के रूप में देता है, प्रेरित के रूप में नहीं (पद 1)। वह नम्रता से शुरू करता है, अधिकार से नहीं। वह फिलेमोन को "प्रिय सहकर्मी" कहता है, और पत्र उसके घर की कलीसिया को भी सम्बोधित है (पद 1-2)। यह अकेले में लिखा निजी पत्र नहीं, पूरी संगति के सामने पढ़ा जाने वाला पत्र है।
फिर वह धन्यवाद देता है: "मैं तेरे प्रेम और उस विश्वास का सुनकर, जो तुझे प्रभु यीशु पर और सब पवित्र लोगों पर है, धन्यवाद देता हूँ" (पद 4-5)। और कहता है: "हे भाई, तेरे प्रेम से मुझे बड़ा आनन्द और शान्ति मिली, क्योंकि तेरे द्वारा पवित्र लोगों के मन तरो-ताज़ा हुए हैं" (पद 7)। फिलेमोन का घर पहले से ही दूसरों को तरोताज़ा करने वाला घर था।
तुम्हारे घर के लिए: किसी से कुछ माँगने से पहले उसमें जो भला है उसे पहचानो और उसके लिए धन्यवाद दो। रिश्ते अधिकार से नहीं, प्रेम की नींव से मज़बूत होते हैं।
ब) एक भगोड़े से एक भाई तक (पद 8-16)
अब पौलुस असली बात पर आता है, पर बहुत नाज़ुकता से। वह कहता है: "यद्यपि मुझे मसीह में बड़ा हियाव है कि जो योग्य बात है वह तुझे आज्ञा दूँ, तौभी प्रेम के कारण मैं विनती ही करना बेहतर समझता हूँ" (पद 8-9)। सामर्थ्यवान होकर भी वह विनम्र माँग चुनता है।
वह उनेसिमुस के बारे में एक शब्दों का खेल भी करता है: "जो पहले तेरे लिये निकम्मा था" (उनेसिमुस के नाम का अर्थ है "लाभदायक"), "पर अब तेरे और मेरे दोनों के लिये लाभदायक है" (पद 11)। वह पौलुस के हृदय के समान प्रिय हो गया था (पद 12)।
फिर सबसे गहरी बात: "क्या जाने वह इसी कारण थोड़ी देर के लिये तुझ से अलग हुआ था कि तू उसे सदा के लिये फिर पा ले, अब दास की नाईं नहीं, पर दास से बढ़कर, अर्थात् प्रिय भाई की नाईं" (पद 15-16)। पौलुस उस कहानी में भी परमेश्वर के हाथ को देखता है जो इंसानी नज़र में सिर्फ एक अपराध या भगदड़ लगती थी।
तुम्हारे घर के लिए: जिन रिश्तों में हमें चोट लगी है, वहाँ भी परमेश्वर कुछ बड़ा कर सकता है। और सुसमाचार किसी को "सेवक" से "भाई" में बदल देता है, चाहे समाज में उसका पद कुछ भी हो।
स) कर्ज़ अपने ऊपर ले लेना - मसीह की तस्वीर (पद 17-20)
अब पौलुस अपने सबसे बड़े दाँव पर आता है: "यदि तू मुझे सहभागी समझता है, तो उसे इस प्रकार ग्रहण कर जैसे मुझे करता। यदि उसने तेरी कुछ हानि की हो, या उस पर तेरा कुछ आता हो, तो मेरे नाम पर लिख ले। मैं पौलुस अपने हाथ से लिखता हूँ, मैं आप भर दूँगा" (पद 17-19)।
यह पत्र का हृदय है, और यहाँ पूरा सुसमाचार एक छोटी कहानी में समा जाता है। उनेसिमुस पर कर्ज़ था, जिसे वह चुका नहीं सकता था। पौलुस, जिसका कोई कर्ज़ नहीं था, कहता है: "वह कर्ज़ मेरे नाम पर लिख दो, मैं भरूँगा।" यही मसीह ने हमारे लिए किया। हम पर कर्ज़ था जो हम चुका नहीं सकते थे, और उसने क्रूस पर वह कर्ज़ अपने ऊपर ले लिया।
पौलुस हल्के-से याद भी दिलाता है: "इसके सिवाय मैं यह नहीं कहता कि तू अपने आप को भी मेरा कर्ज़दार समझता है" (पद 19), यानी फिलेमोन का उद्धार भी पौलुस के द्वारा ही आया था। फिर वह कहता है: "हे भाई, प्रभु में मुझे तुझ से यह लाभ मिले; मेरे मन को मसीह में तरो-ताज़ा कर" (पद 20)।
तुम्हारे घर के लिए: जब घर में किसी की गलती से किसी और को नुकसान हो, तो प्रेम वह है जो बीच में खड़े होकर कहे, "मैं इसका बोझ उठाऊँगा", जैसे मसीह ने हमारा बोझ उठाया।
द) भरोसा और साझी संगति (पद 21-25)
पौलुस विनती के साथ भरोसा भी जोड़ता है: "मुझे तेरी आज्ञाकारिता का भरोसा करके तुझे लिखा है, यह जानकर कि जो मैं कहता हूँ उससे भी तू बढ़कर करेगा" (पद 21)। (यहाँ पौलुस विशेष रूप से क्या माँग रहा था, यह पद में साफ नहीं लिखा; परम्परा में इसे उनेसिमुस को स्वतंत्र करने या कम-से-कम उसे भाई मानकर रखने की विनती समझा जाता है।) वह यह भी कहता है कि "मेरे लिये अतिथि-सत्कार तैयार रखना, क्योंकि मुझे आशा है कि तुम्हारी प्रार्थनाओं से मैं तुम्हें दिया जाऊँगा" (पद 22)।
अंत में वह अपने साथियों के नाम गिनाता है, जो सब घरेलू कलीसियाओं में जाने-पहचाने नाम थे: इपफ्रास, मरकुस, अरिस्तर्खुस, देमास और लूका (पद 23-24)। यह पत्र भी, कुलुस्सियों की तरह, एक बड़े नेटवर्क की एक कड़ी था।
तुम्हारे घर के लिए: भरोसा जताना भी प्रेम का एक तरीका है। जब हम किसी से भलाई की उम्मीद के साथ बात करते हैं, न कि शक के साथ, तो वह उस भरोसे के योग्य बनने की कोशिश करता है।
3. तुम्हारे घर के लिए 3 काम
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किसी को नए सिरे से देखो (पद 11, 15-16) - घर में या संगति में कोई ऐसा हो जिसे तुमने "बेकार" या "निकम्मा" मान लिया हो, उसे आज मसीह की नज़र से देखो। पूछो: "परमेश्वर इसमें क्या बदल रहा है?"
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कर्ज़ अपने ऊपर लेना सीखो (पद 18-19) - जब घर में किसी की गलती से किसी और को चोट पहुँचे, तो सुलह कराने वाला बनो, यहाँ तक कि उसका बोझ खुद उठाने को तैयार रहो, जैसे मसीह ने हमारे लिए किया।
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विनती से बात करो, अधिकार से नहीं (पद 8-9) - इस सप्ताह घर में किसी बात को आज्ञा से नहीं, प्रेम भरी विनती से कहने का अभ्यास करो, खासकर बच्चों और छोटों के साथ।
आज की प्रार्थना:
"हे पिता, तूने हमारा कर्ज़ अपने ऊपर ले लिया और मसीह के लहू से हमें चुका दिया। हमें सिखा कि हम भी एक-दूसरे को दास की तरह नहीं, भाई-बहन की तरह देखें। हमारे घर को क्षमा और सुलह का घर बना, और हमें अधिकार से नहीं, प्रेम से एक-दूसरे से बात करना सिखा। आमीन।"
आज की घोषणा:
"मैं मसीह में दास नहीं, प्रिय भाई-बहन हूँ! मेरा कर्ज़ मसीह ने अपने ऊपर ले लिया और भर दिया! मेरा घर सुलह और तरोताज़गी का घर है! हम एक-दूसरे को नए सिरे से, मसीह की नज़र से देखते हैं!" (पद 16, 18-19, 7)
आज का कार्य:
आज परिवार के साथ बैठकर पूरा फिलेमोन का पत्र पढ़ें (यह छोटा है)। हर एक व्यक्ति सोचे कि "क्या मैंने किसी को उसकी गलती के कारण 'बेकार' मान लिया है?" और उस व्यक्ति के लिए आज ही क्षमा और नई शुरुआत की प्रार्थना करें।
"हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह तुम्हारी आत्मा के साथ रहे।" (पद 25)
शालोम,

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