पौलुस का दूसरा पत्र - 2 थिस्सलुनीकियों में,

मुख्य वचन:

"प्रभु विश्वासयोग्य है; वह तुम्हें दृढ़ करेगा और उस दुष्ट से बचाए रखेगा।" - 2 थिस्सलुनीकियों 3:3, 

1. पौलुस का दूसरा पत्र कौन सा है?

पौलुस का दूसरा पत्र है - 2 थिस्सलुनीकियों का पत्र। इसे पहले पत्र के कुछ ही समय बाद, लगभग ई. 51 में, कुरिन्थुस से लिखा गया माना जाता है।

यह उसी कलीसिया को लिखा गया जिसे पहले पत्र में पौलुस ने थामा था। पहले पत्र के बाद दो बातें हुईं। सताव और बढ़ गया। और कुछ लोगों ने यह अफवाह फैला दी कि "प्रभु का दिन आ चुका है" (2:2), जिससे विश्वासी घबरा गए। कुछ लोग यह सोचकर कि प्रभु आने ही वाला है, काम छोड़कर बैठ गए (3:11)।

इसलिए पहला पत्र समझो नींव है (विश्वास, प्रेम, आशा), और यह दूसरा पत्र स्थिरता है: दुख में डटे रहना, अफवाहों में न बहना, और व्यवस्थित जीवन जीना।

घर की कलीसिया के लिए यह पत्र बहुत काम का है, क्योंकि छोटी संगतियों में अफवाहें, डर और ढीलापन सबसे जल्दी घुसते हैं।

2. इस दूसरे पत्र का मुख्य संदेश क्या है?

इस पत्र का एक ही प्रश्न है - सताव, भ्रम और ढीलेपन के बीच कलीसिया प्रभु में स्थिर कैसे रहे?

पौलुस इसका उत्तर 4 भागों में देता है:

अ) प्रोत्साहन - तुम्हारा विश्वास बढ़ रहा है, परमेश्वर धर्मी न्यायी है (अध्याय 1)

पौलुस धन्यवाद देता है कि तुम्हारा विश्वास बहुत बढ़ता जाता है और एक-दूसरे के प्रति प्रेम भी (1:3)। खास बात यह है कि यह बढ़ना सताव के बीच हो रहा था। क्लेश ने उन्हें तोड़ा नहीं, गहरा किया।

पौलुस उन्हें याद दिलाता है कि परमेश्वर का न्याय धर्ममय है। जब प्रभु यीशु स्वर्ग से प्रकट होगा, तब क्लेश सहने वालों को चैन मिलेगा, और जो परमेश्वर को नहीं मानते, उन्हें उनके कर्मों का फल मिलेगा (1:6-9)। इसलिए हमें बदला लेने की ज़रूरत नहीं, हम न्याय परमेश्वर पर छोड़ सकते हैं।

और उसकी प्रार्थना देखिए: "हमारा परमेश्वर तुम्हें अपनी बुलाहट के योग्य ठहराए और हर भली इच्छा और विश्वास के काम को सामर्थ्य से पूरा करे" (1:11)। लक्ष्य यह है कि प्रभु यीशु का नाम हम में महिमा पाए (1:12)।

तुम्हारे घर के लिए: जब घर में दुख, विरोध या ताने आएँ, तो याद रखो कि परमेश्वर देख रहा है और वह धर्मी न्यायी है। दुख हमें बदले की ओर नहीं, प्रार्थना और बढ़ते विश्वास की ओर ले जाए।

ब) सावधानी - घबराओ मत, धोखा मत खाओ, स्थिर रहो (अध्याय 2)

जब अफवाह फैली कि प्रभु का दिन आ चुका है, तो पौलुस ने कहा: "किसी बात से जल्दी अस्थिर या घबरा न जाओ" (2:2)। घबराहट सत्य की निशानी नहीं, अक्सर धोखे की निशानी होती है।

पौलुस बताता है कि उस दिन से पहले बड़ा विद्रोह और अधर्म का पुरुष प्रकट होगा, और लोग सत्य से प्रेम न रखने के कारण झूठ के धोखे में पड़ेंगे (2:3-12)। (इस भाग की व्याख्या में विद्वानों के बीच मतभेद हैं, इसलिए घर की सभा में हर छोटी बात पर बहस के बजाय इसका मुख्य सबक लें: धोखे से बचने का उपाय सत्य से प्रेम है।)

फिर पौलुस विश्वासियों की ओर मुड़ता है और उन्हें भरोसा देता है: "परमेश्वर ने तुम्हें आरम्भ से उद्धार के लिये चुन लिया, आत्मा के पवित्र करने और सत्य पर विश्वास के द्वारा" (2:13)। इसलिए "स्थिर रहो और जो शिक्षा तुम्हें सिखाई गई है उसे थामे रहो" (2:15)।

उसकी प्रार्थना सुनिए: हमारे प्रभु यीशु मसीह और हमारा पिता परमेश्वर, जिसने हम से प्रेम किया और अनन्त शान्ति और उत्तम आशा अनुग्रह से दी, तुम्हारे हृदयों को शान्ति दे और हर अच्छे काम और वचन में दृढ़ करे (2:16-17)।

तुम्हारे घर के लिए: हर सुनी हुई बात पर घबराने की जगह वचन पर टिको। कोई भी नई शिक्षा, संदेश या अफवाह आए, तो उसे वचन से परखो (पहले पत्र में भी 5:21)। सत्य से प्रेम ही घर की सबसे बड़ी सुरक्षा है।

स) भरोसा - प्रभु विश्वासयोग्य है (अध्याय 3:1-5)

पौलुस, जो इतना बड़ा प्रेरित है, उनसे प्रार्थना की माँग करता है: "हमारे लिये प्रार्थना करो कि प्रभु का वचन शीघ्र फैले और महिमा पाए" (3:1)। वह मानता है कि बुरे और दुष्ट लोगों से छुटकारे के लिए उसे भी कलीसिया की प्रार्थना चाहिए (3:2)।

फिर वह ठहरकर एक बड़ी बात कहता है: "प्रभु विश्वासयोग्य है; वह तुम्हें दृढ़ करेगा और उस दुष्ट से बचाए रखेगा" (3:3)। हमारी स्थिरता हमारी ताकत पर नहीं, उसकी विश्वासयोग्यता पर टिकी है।

और उसकी प्रार्थना: "प्रभु तुम्हारे हृदयों को परमेश्वर के प्रेम और मसीह के धीरज की ओर ले चले" (3:5)।

तुम्हारे घर के लिए: अपने अगुवों, प्रचारकों और सेवकों के लिए नियमित प्रार्थना करो। और अपने घर के लिए यह भरोसा रखो कि जो तुम्हें बुलाता है, वही तुम्हें थामे रखता है।

द) व्यवस्था - शांत मेहनत और भलाई में न थकना (अध्याय 3:6-15)

कुछ लोग अव्यवस्थित चल रहे थे। वे काम नहीं करते थे और दूसरों के कामों में दखल देते थे (3:6, 11)। पौलुस अपना उदाहरण देता है कि हमने किसी की रोटी मुफ्त नहीं खाई, बल्कि दिन-रात मेहनत की, ताकि तुम पर बोझ न पड़े और तुम हमारा अनुकरण कर सको (3:7-9)।

वह लिखता है कि जो काम करना नहीं चाहता, वह खाने भी न पाए (3:10), और ऐसे लोगों को आदेश देता है कि शान्ति से काम करके अपनी ही रोटी खाएँ (3:12)। (यह उन पर लागू होता है जो काम कर सकते हैं पर करना नहीं चाहते, उन पर नहीं जो बीमारी या लाचारी के कारण नहीं कर पाते।)

फिर वह सब से कहता है: "भलाई करने में हियाव न छोड़ो" (3:13)। और जो नहीं मानता, उसके साथ शत्रु की तरह व्यवहार नहीं, भाई जानकर चिताओ (3:15)। अनुशासन का उद्देश्य नीचा दिखाना नहीं, लौटा लाना है।

तुम्हारे घर के लिए: प्रभु की वापसी की आशा हमें निकम्मा नहीं बनाती, और भी परिश्रमी बनाती है। जो अपना कर्तव्य निभाता हुआ प्रभु की प्रतीक्षा करता है, वही सच्चा प्रतीक्षा करने वाला है।

3. तुम्हारे घर के लिए 3 काम

  1. अफवाह में नहीं, वचन में स्थिर रहो (2:2, 15) - घर में कोई भी डरावनी या नई बात सुनो, तो पहले वचन खोलो। बच्चों को भी सिखाओ कि हर बात मानने से पहले पूछो: "क्या यह वचन से मेल खाती है?"

  2. ईमानदारी से मेहनत करो, भलाई में थको मत (3:10-13) - अपने काम, पढ़ाई और घर की ज़िम्मेदारियों को प्रभु के लिए करो। आलस्य और दूसरों के मामलों में दखल से बचो।

  3. प्रार्थना करो और एक-दूसरे के लिए धन्यवाद दो (1:3, 2:13, 3:1) - रोज़ घर के हर सदस्य का नाम लेकर धन्यवाद दो और अपने अगुवों तथा सुसमाचार के फैलने के लिए प्रार्थना करो।

आज की प्रार्थना:

"हे पिता, हमें सताव में भी दृढ़ रख। अफवाहों और डर से हमें बचा। हमारे घर को अपने वचन में स्थिर कर, हमें परिश्रमी और भलाई में न थकने वाला बना, और हमारे हृदयों को अपने प्रेम और मसीह के धीरज की ओर ले चल। आमीन।"

आज की घोषणा:

"मेरा घर अफवाह से नहीं डरता, वचन में स्थिर है! प्रभु विश्वासयोग्य है, वह हमें दृढ़ करेगा और उस दुष्ट से बचाए रखेगा! हम भलाई करने में थकेंगे नहीं, और अपने प्रभु की प्रतीक्षा में परिश्रम से चलेंगे!" (3:3, 13)

आज का कार्य:

आज परिवार के साथ बैठकर 2 थिस्सलुनीकियों 2:13-17 पढ़ें। हर एक व्यक्ति बताए कि "किस बात में मुझे परमेश्वर की स्थिरता चाहिए?" फिर एक-दूसरे के लिए 3:16 के अनुसार शान्ति की प्रार्थना करें।

"शान्ति का प्रभु आप ही तुम्हें सदा और हर प्रकार से शान्ति दे। प्रभु तुम सब के साथ रहे।" (3:16)

शालोम,

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