पौलुस का ग्यारहवाँ पत्र - 1 तीमुथियुस में,

मुख्य वचन:

"पर यदि मुझे देर हो जाए, तो तू यह जान ले कि परमेश्वर के घराने में लोगों को कैसे चलना चाहिए, यह घराना जीवते परमेश्वर की कलीसिया है, जो सत्य का खम्भा और आधार है।" - (1 तीमुथियुस 3:15) 
(भावार्थ)

1. पौलुस का ग्यारहवाँ पत्र कौन सा है?

यह पौलुस का ग्यारहवाँ पत्र है - 1 तीमुथियुस का पत्र। पिछले दस पत्र थिस्सलुनीके (दो), गलातिया, कुरिन्थुस (दो), रोम, इफिसुस, फिलिप्पी, कुलुस्से और फिलेमोन को गए थे।

यह पत्र पिछले पत्रों से अलग है, क्योंकि यह किसी कलीसिया को नहीं, एक व्यक्ति को लिखा गया है, अपने आत्मिक पुत्र तीमुथियुस को (1:2)। इसे पास्टोरल पत्र (चरवाहे का पत्र) कहा जाता है, क्योंकि इसमें पौलुस बताता है कि कलीसिया की देखभाल कैसे की जाए। परम्परा के अनुसार यह पत्र पौलुस की कैद से छूटने के बाद, लगभग ई. 62-64 में मकिदुनिया से लिखा गया।

पौलुस ने तीमुथियुस को इफिसुस में छोड़ा था, ताकि वह कुछ लोगों को झूठी शिक्षाओं से रोके (1:3)। तीमुथियुस पौलुस की दूसरी मिशनरी यात्रा से उसके साथ था (प्रेरितों 16:1-3), और उसकी जड़ें घर में थीं: उसकी नानी लोइस और माँ यूनीके का सच्चा विश्वास उसमें भी बस गया था (2 तीमुथियुस 1:5)। यह याद दिलाता है कि सबसे बड़े सेवक भी अक्सर किसी घर की भक्ति से निकलते हैं।

इफिसुस की कलीसिया घरों में मिलती थी (जैसे अक्विला-प्रिस्का का घर, 1 कुरिन्थियों 16:19), और वहाँ कुछ झूठे शिक्षक "निकम्मी बकवास" और बेकार वंशावलियों में उलझा रहे थे (1:4, 6)। इसलिए पौलुस इस पत्र में तीमुथियुस को सिखाता है कि घराने को, यानी कलीसिया को कैसे व्यवस्थित और स्वस्थ रखा जाए।

2. इस ग्यारहवें पत्र का मुख्य संदेश क्या है?

इस पत्र का एक ही प्रश्न है - परमेश्वर के घराने को स्वस्थ, सच्चा और व्यवस्थित कैसे रखा जाए?

पौलुस इसका उत्तर 5 भागों में देता है:

अ) शुद्ध शिक्षा और कृतज्ञ हृदय (अध्याय 1)

पौलुस चाहता है कि व्यवस्था "शुद्ध हृदय, अच्छे विवेक और निष्कपट विश्वास से उत्पन्न प्रेम" की ओर ले जाए (1:5)। झूठी शिक्षा भ्रम में डालती है, पर सच्ची शिक्षा प्रेम की ओर ले जाती है।

फिर पौलुस अपनी गवाही देता है। वह पहले निन्दक, सतानेवाला और हिंसक था, पर परमेश्वर ने उस पर दया की, "कि मुझ में जो प्रधान पापी हूँ, यीशु मसीह अपना पूरा धीरज दिखाए, ताकि यह उन के लिये आदर्श हो जो अनन्त जीवन के लिये उस पर विश्वास लाएँगे" (1:15-16)। अपने सबसे बुरे अतीत को भी वह परमेश्वर की महिमा में बदल देता है।

तुम्हारे घर के लिए: शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान बढ़ाना नहीं, शुद्ध प्रेम पैदा करना है। और कोई भी अतीत इतना बुरा नहीं कि परमेश्वर उसे गवाही में न बदल सके।

ब) प्रार्थना और घर में स्त्री-पुरुष का स्थान (अध्याय 2)

पौलुस पहले प्रार्थना पर ज़ोर देता है: "विनती, प्रार्थना, निवेदन और धन्यवाद सब मनुष्यों के लिये किए जाएँ, विशेष करके राजाओं और सब अधिकारियों के लिये, कि हम शान्ति और सुख से भक्ति और गंभीरता में जीवन बिताएँ" (2:1-2)। कलीसिया की प्रार्थना सिर्फ अपने लिए नहीं, पूरे समाज के लिए है।

फिर वह मसीह के काम को दोहराता है: "क्योंकि एक ही परमेश्वर है, और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच एक ही बिचवई है, अर्थात् मसीह यीशु जो मनुष्य है, जिसने अपने आप को सब के छुटकारे के दाम में दे दिया" (2:5-6)।

आगे पौलुस सभा में स्त्री-पुरुष की व्यवस्था पर बात करता है (2:8-15)। (यह पत्र का सबसे चर्चा किया गया हिस्सा है, और इसकी व्याख्या पर मसीही कलीसियाओं में अलग-अलग समझ है। यहाँ हम इसका मूल सिद्धान्त लेते हैं: सभा में शान्ति, आदर और शालीनता होनी चाहिए, न कि झगड़ा या दिखावा।) पौलुस पुरुषों से कहता है कि क्रोध और विवाद के बिना पवित्र हाथ उठाकर प्रार्थना करें (2:8), और स्त्रियों से कि वे संकोच और सुबुद्धि के साथ भले कामों से सजें, न कि गहनों और दिखावे से (2:9-10)।

तुम्हारे घर के लिए: अपने घर और मोहल्ले के अधिकारियों के लिए नियमित प्रार्थना करो। और घर की सभा में सब सुबुद्धि, शालीनता और शान्ति के साथ भाग लें।

स) अगुवों की पहचान (अध्याय 3)

यहाँ पौलुस बताता है कि कलीसिया, यानी घराने का अगुवा कैसा होना चाहिए। "जो अध्यक्ष का पद चाहता है, वह अच्छे काम की लालसा करता है" (3:1)। फिर एक सूची आती है (3:2-7): निर्दोष, एक ही पत्नी का पति, संयमी, सुबुद्ध, व्यवस्थित, पहुनाई करने वाला, सिखाने में निपुण, पियक्कड़ या मार-पीट करने वाला नहीं, पर कोमल, कलहरहित, धन का लोभी नहीं, अपने घर का अच्छी रीति से प्रबन्ध करने वाला, नया शिष्य नहीं, और बाहर वालों में भी अच्छी साख वाला।

ध्यान दीजिए: "यदि कोई अपने घर का प्रबन्ध करना न जानता हो, तो वह परमेश्वर की कलीसिया की चिन्ता कैसे करेगा?" (3:5)। घर की अगुवाई कलीसिया की अगुवाई की पहली पाठशाला है।

सेवकों (डीकन) के लिए भी वैसी ही सूची है, गंभीर, दोमुँहे नहीं, बहुत दाखरस के गुलाम नहीं, नीच कमाई के लोभी नहीं, विश्वास के भेद को शुद्ध विवेक से थामे रहने वाले (3:8-13)।

फिर पत्र का मुख्य वचन आता है: "परमेश्वर के घराने में लोगों को कैसे चलना चाहिए, यह घराना जीवते परमेश्वर की कलीसिया है, जो सत्य का खम्भा और आधार है" (3:15)। और उसके बाद भक्ति का एक भजन: "वह देह में प्रगट हुआ, आत्मा में धर्मी ठहरा, स्वर्गदूतों को दिखाई दिया... महिमा में ऊपर उठाया गया" (3:16)।

तुम्हारे घर के लिए: अगुवाई की तैयारी घर से शुरू होती है। जो घर में विश्वासयोग्य, संयमी और मेहनती है, वही कलीसिया में भी वैसा होगा।

द) एक अच्छा सेवक बनने का रास्ता (अध्याय 4)

पौलुस चेतावनी देता है कि आने वाले दिनों में कुछ लोग विश्वास से बहककर भरमाने वाली आत्माओं की सुनेंगे, विवाह से मना करेंगे और कुछ भोजनों से परहेज़ सिखाएँगे, जबकि परमेश्वर की हर सृष्टि अच्छी है और धन्यवाद से ग्रहण करने पर पवित्र ठहरती है (4:1-5)।

फिर वह तीमुथियुस को, और हर घर के सेवक को, यह सलाह देता है: "शरीर का व्यायाम तो थोड़ा लाभदायक है, पर भक्ति सब बातों में लाभदायक है, क्योंकि उस में इस जीवन की और आने वाले जीवन की भी प्रतिज्ञा है" (4:8)।

फिर एक वचन जो हर छोटी उम्र या अनुभवहीन सेवक के लिए है: "कोई तेरी जवानी को तुच्छ न जाने, पर वचन, चाल-चलन, प्रेम, विश्वास और पवित्रता में विश्वासियों के लिये आदर्श बन" (4:12)। और "अपने और अपनी शिक्षा पर ध्यान दे... क्योंकि ऐसा करने से तू अपना और अपने सुनने वालों का भी उद्धार करेगा" (4:16)।

तुम्हारे घर के लिए: भक्ति यानी वचन पढ़ना, प्रार्थना करना और परमेश्वर के साथ चलना, यह घर की सबसे लाभदायक "कसरत" है। और उम्र या अनुभव कम होने पर भी, प्रेम और पवित्रता में आदर्श बना जा सकता है।

य) घराने की देखभाल - बुज़ुर्ग, विधवा और सेवा (अध्याय 5-6)

पौलुस घर जैसी भाषा में कलीसिया की देखभाल सिखाता है: "बूढ़े को न डाँट, पर बाप जान के समझा; जवानों को भाई जानकर, बूढ़ी स्त्रियों को माता जानकर, और जवान स्त्रियों को पूरी पवित्रता के साथ बहन जानकर समझा" (5:1-2)। कलीसिया एक परिवार की तरह काम करती है।

विधवाओं की देखभाल पर वह एक साफ सिद्धान्त देता है: "यदि किसी विधवा के बाल-बच्चे या नाती-पोते हों, तो वे पहले अपने ही घराने के साथ भक्ति दिखाना और अपने माता-पिता का बदला चुकाना सीखें, क्योंकि यह परमेश्वर को भाता है" (5:4)। और एक कड़ी चेतावनी: "यदि कोई अपने कुटुम्बियों की, विशेष करके अपने घराने की, चिन्ता नहीं करता, तो उसने विश्वास से इनकार किया, और वह अविश्वासी से भी बुरा है" (5:8)।

धन के बारे में पौलुस याद दिलाता है: "भक्ति सन्तोष सहित बड़ी कमाई है। क्योंकि हम जगत में कुछ भी लेकर नहीं आए, इसलिये हम उससे कुछ ले भी नहीं जा सकते" (6:6-7)। और वह चेतावनी देता है: "रुपये का लोभ सब प्रकार की बुराइयों की जड़ है" (6:10)। धनवानों को कहा जाता है कि वे धन पर आशा न रखें, पर "भलाई करें, भले कामों में धनी हों, उदार और सहायता करने में तत्पर हों" (6:17-18)।

पत्र समाप्त होता है इस चेतावनी और आशीष के साथ: "हे तीमुथियुस, जो तेरे पास धरोहर रखी गई है, उसकी रखवाली कर" (6:20)।

तुम्हारे घर के लिए: अपने घर के बुज़ुर्गों और ज़रूरतमंद रिश्तेदारों की देखभाल करना विश्वास से बड़ा साबित है, चर्च की गतिविधियों से भी पहले। और धन में नहीं, सन्तोष और उदारता में असली धनी बनो।

3. तुम्हारे घर के लिए 3 काम

  1. घर को अगुवाई की पहली पाठशाला बनाओ (3:4-5) - इस सप्ताह अपने घर के प्रबन्ध पर ध्यान दो: समय, पैसा, ज़िम्मेदारियाँ। जो घर में विश्वासयोग्य है, वही बाहर भी विश्वासयोग्य होगा।

  2. पहले अपने घराने की चिन्ता करो (5:4, 8) - इस महीने अपने घर के किसी बुज़ुर्ग, विधवा या ज़रूरतमंद रिश्तेदार से मिलने जाओ या उनकी सहायता करो। बाहर की सेवा से पहले अपनों की ज़िम्मेदारी निभाओ।

  3. भक्ति और सन्तोष का अभ्यास करो (4:7-8, 6:6-8) - रोज़ थोड़ा समय वचन और प्रार्थना के लिए अलग रखो, जैसे व्यायाम के लिए समय निकालते हो। और जो है उसमें सन्तोष का अभ्यास करो, धन की दौड़ में मत पड़ो।

आज की प्रार्थना:

"हे पिता, हमारे घर को अपना सत्य का खम्भा और आधार बना। हमें भक्ति में और सन्तोष में बढ़ा, हमें अपने घराने की चिन्ता करना सिखा, और हमें शुद्ध हृदय और सच्चे विश्वास से प्रेम करने वाला बना। जो धरोहर तूने हमें सौंपी है, उसकी रखवाली करने में हमारी सहायता कर। आमीन।"

आज की घोषणा:

"मेरा घर जीवते परमेश्वर की कलीसिया है, सत्य का खम्भा और आधार! हम भक्ति में सन्तोष के साथ चलते हैं! हम पहले अपने घराने की चिन्ता करते हैं! मसीह ही हमारा एक बिचवई है, जिसने अपने आप को हमारे लिए दे दिया!" (3:15, 6:6, 5:8, 2:5-6)

आज का कार्य:

आज परिवार के साथ बैठकर 1 तीमुथियुस 3:1-13 पढ़ें, और हर एक व्यक्ति सोचे: "मुझे किस गुण में और बढ़ना है, ताकि मैं घर में और कलीसिया में भरोसेमन्द बनूँ?" फिर घर के किसी बुज़ुर्ग या ज़रूरतमंद रिश्तेदार के लिए एक ठोस मदद की योजना बनाएँ।

"अनुग्रह तुम्हारे साथ रहे।" (6:21)

शालोम,

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