पौलुस का सातवाँ पत्र - इफिसियों में,

मुख्य वचन:

"अब तुम परदेशी और अजनबी नहीं रहे, पर पवित्र लोगों के संगी नागरिक और परमेश्वर के घराने के सदस्य हो।" - इफिसियों 2:19,

1. पौलुस का सातवाँ पत्र कौन सा है?

पौलुस का सातवाँ पत्र है - इफिसियों का पत्र। पिछले छह पत्र थिस्सलुनीके (दो), गलातिया, कुरिन्थुस (दो) और रोम को गए थे।

यह पत्र पौलुस ने कैद में रहते हुए लिखा, माना जाता है कि रोम की कैद से, लगभग ई. 60-62 में। वह खुद को "प्रभु में बन्दी" कहता है (4:1), और अपने बारे में लिखता है कि "मैं जंजीर में बँधा हुआ राजदूत हूँ" (6:20)। पत्र तुखिकुस के हाथ भेजा गया (6:21)। (कैद के दिनों के पत्रों का ठीक क्रम विद्वानों में अलग-अलग माना जाता है। हमारी श्रृंखला में हम बाइबल में आने के लोकप्रिय क्रम को ले रहे हैं।)

इफिसुस एशिया का बड़ा शहर था, जहाँ पौलुस ने लगभग तीन वर्ष सेवकाई की थी (प्रेरितों 20:31)। वहाँ अक्विला और प्रिस्का का घर भी कलीसिया के मिलने की जगह था (1 कुरिन्थियों 16:19)। कुछ प्राचीन प्रतियों में पद 1:1 में "इफिसुस में" शब्द नहीं मिलते, इसलिए कई विद्वान मानते हैं कि यह पत्र आस-पास की कई कलीसियाओं के बीच घुमाया जाने वाला पत्र था।

इस पत्र की खास बात यह है कि इसमें किसी बड़ी समस्या पर बहस नहीं है। पौलुस बस एक ऊँची चढ़ाई करवाता है: पहले तीन अध्यायों में हम मसीह में क्या हैं, और अगले तीन अध्यायों में हमें कैसे चलना है

घर की कलीसिया के लिए यह पत्र बहुत ही खास है, क्योंकि इसमें पौलुस कलीसिया को परमेश्वर का घराना कहता है (2:19), और अंत में सीधा घर-परिवार के रिश्तों पर बोलता है।

2. इस सातवें पत्र का मुख्य संदेश क्या है?

इस पत्र का एक ही प्रश्न है - मसीह में हमें जो मिला है, क्या हम उसके योग्य चाल चल रहे हैं?

पौलुस इसका उत्तर 5 भागों में देता है:

अ) पहचान - मसीह में हर आत्मिक आशीष (अध्याय 1)

पत्र स्तुति से खुलता है: "धन्य है हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता, जिसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में हर प्रकार की आत्मिक आशीष दी है" (1:3)। ध्यान दीजिए, यह "मिलेगी" नहीं, "दी है" है। और "मसीह में" यह शब्द इस अध्याय में बार-बार आता है।

पौलुस गिनाता है कि हमें क्या मिला:

  • चुनाव: जगत की उत्पत्ति से पहले उसने हमें मसीह में चुना, कि हम पवित्र और निर्दोष हों (1:4)
  • लेपालक पुत्र होना: वह हमें प्रेम से अपने पुत्र यीशु के द्वारा अपनी सन्तान बनाना चाहता था (1:5)
  • छुटकारा और क्षमा: उसके लहू के द्वारा (1:7)
  • पवित्र आत्मा की मुहर: हमारी मीरास की बयाना (1:13-14)

फिर उसकी प्रार्थना सुनिए: "तुम्हारे मन की आँखें ज्योतिर्मय हों, ताकि तुम जानो कि उसकी बुलाहट की आशा क्या है" (1:18)। यह प्रार्थना नए ज्ञान के लिए कम, आँखें खुलने के लिए ज़्यादा है।

तुम्हारे घर के लिए: हम परमेश्वर से कुछ पाने की भीख माँगते हुए नहीं, जो मिल चुका है उसमें चलते हुए जीते हैं। हर सुबह घर में यह कहो: "हमें मसीह में सब कुछ मिल चुका है।"

ब) उद्धार - अनुग्रह से, और भले कामों के लिए (अध्याय 2:1-10)

पहले पौलुस हमारी पुरानी हालत बताता है: "तुम अपने अपराधों और पापों में मरे हुए थे" (2:1)। फिर वह दो शब्दों से पूरी तस्वीर बदल देता है: "परन्तु परमेश्वर ने" (2:4)। वह दया का धनी है, और अपने बड़े प्रेम के कारण उसने हमें मसीह के साथ जिलाया।

फिर उद्धार का सबसे प्रसिद्ध वचन: "अनुग्रह से विश्वास के द्वारा तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, परमेश्वर का दान है; और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे" (2:8-9)।

पर वचन यहीं नहीं रुकता। अगला पद कहता है: "क्योंकि हम उसकी रचना हैं, और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिये सृजे गए जिन्हें परमेश्वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किया" (2:10)। भले काम उद्धार पाने का रास्ता नहीं, उद्धार पाने का फल हैं।

तुम्हारे घर के लिए: अनुग्रह हमें आलसी नहीं बनाता, उद्देश्य देता है। हर एक को यह पता होना चाहिए: "परमेश्वर ने मेरे लिए कुछ भले काम पहले से तैयार किए हैं।"

स) एक नया घराना - बीच की दीवार टूट गई (अध्याय 2:11 - 3)

पौलुस अन्यजाति विश्वासियों से कहता है कि पहले तुम मसीह से दूर, प्रतिज्ञाओं से बाहर और आशा रहित थे। "पर अब मसीह यीशु में तुम जो पहले दूर थे, मसीह के लहू के द्वारा निकट हो गए हो" (2:13)। "क्योंकि वही हमारा मेल-मिलाप है" जिसने दोनों को एक कर दिया और बीच की दीवार ढा दी (2:14)।

फिर वह कलीसिया की तीन तस्वीरें देता है (2:19-22):

  • संगी नागरिक: हम सब एक ही राज्य के नागरिक हैं
  • परमेश्वर के घराने के सदस्य: हम परिवार हैं
  • पवित्र मन्दिर: मसीह कोने का मुख्य पत्थर है, और हम सब मिलकर आत्मा में परमेश्वर का निवासस्थान बन रहे हैं

अध्याय 3 में वह इस भेद को बताता है कि अन्यजाति और यहूदी संगी वारिस, एक ही देह के अंग हैं (3:6)। और कलीसिया के द्वारा परमेश्वर की अनेक रंगों वाली बुद्धि प्रकट होती है (3:10)। यानी हमारी संगति सिर्फ हमारे लिए नहीं, आत्मिक जगत के लिए भी गवाही है।

फिर उसकी दूसरी प्रार्थना, जो हर घर की कलीसिया के लिए लिखी गई है: "वह अपनी महिमा के धन के अनुसार तुम्हें यह दे कि तुम उसके आत्मा से अपने भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ्य पाकर बलवन्त हो जाओ; और मसीह विश्वास के द्वारा तुम्हारे हृदयों में बसे; और तुम प्रेम में जड़ पकड़कर और नींव डालकर... मसीह के प्रेम की चौड़ाई, लम्बाई, ऊँचाई और गहराई को समझ सको" (3:16-19)।

तुम्हारे घर के लिए: तुम्हारा घर परमेश्वर का घराना है। यहाँ कोई परदेशी या अजनबी नहीं। जो भी नया आए, उसे "बाहर वाला" नहीं, "घर का सदस्य" बनाकर स्वागत करो।

द) चाल - एकता और नया मनुष्य (अध्याय 4:1 - 5:21)

अब पत्र का मोड़ आता है: "इसलिये मैं जो प्रभु में बन्दी हूँ, तुम से विनती करता हूँ कि जिस बुलाहट से तुम बुलाए गए हो, उसके योग्य चाल चलो" (4:1)। कैसे? "सारी दीनता और नम्रता सहित, धीरज धरकर प्रेम से एक-दूसरे की सह लो, और मेल के बन्धन में आत्मा की एकता रखने का यत्न करो" (4:2-3)। एकता बनानी नहीं है, वह आत्मा की दी हुई है, हमें उसे बनाए रखने का यत्न करना है।

फिर सात बार "एक": एक देह, एक आत्मा, एक आशा, एक प्रभु, एक विश्वास, एक बपतिस्मा, एक परमेश्वर (4:4-6)।

मसीह ने वरदान दिए, "प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, सुसमाचार प्रचारक, रखवाले और उपदेशक", पर उनका उद्देश्य क्या है? "पवित्र लोगों को सेवा के काम के लिये तैयार करना, ताकि मसीह की देह उन्नति पाए" (4:11-12)। यानी सेवा सिर्फ अगुवों का काम नहीं, अगुवा सब को सेवा के लिए तैयार करते हैं। और सब प्रेम में सत्य बोलते हुए मसीह में बढ़ें (4:15)।

फिर नए मनुष्य का व्यावहारिक जीवन:

  • पुराना मनुष्य उतारो, नया पहनो (4:22-24)
  • झूठ छोड़कर सच बोलो (4:25)
  • "क्रोध तो करो, पर पाप मत करो; सूर्य अस्त होने तक तुम्हारा क्रोध न रहे" (4:26)
  • कोई गन्दी बात तुम्हारे मुँह से न निकले, पर वही जो उन्नति के लिए उत्तम हो (4:29)
  • पवित्र आत्मा को शोकित मत करो (4:30)
  • "एक-दूसरे पर कृपाल और करुणामय हो, और जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक-दूसरे के अपराध क्षमा करो" (4:32)

फिर प्रेम में चलो (5:2), ज्योति की सन्तान की तरह चलो (5:8), और आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ (5:18)। इसका फल है भजन गाना, हृदय से प्रभु के लिए स्तुति करना और सब बातों के लिए धन्यवाद देना (5:19-20)।

तुम्हारे घर के लिए: छोटे घरों में ठेस जल्दी लगती है, इसलिए कड़वाहट को रात भर मत टिकने दो। मुँह से निकला हर शब्द या तो घर की दीवार उठाएगा या ढाएगा।

य) घर और युद्ध - रिश्ते और आत्मिक कवच (अध्याय 5:22 - 6:24)

पौलुस पहले एक सिद्धांत रखता है: "मसीह के भय से एक-दूसरे के अधीन रहो" (5:21)। इसी नींव पर घर के रिश्ते हैं।

  • पति और पत्नी (5:22-33): पत्नी अपने पति का आदर करे, और पति अपनी पत्नी से वैसा प्रेम करे जैसा मसीह ने कलीसिया से किया और उसके लिये अपने आप को दे दिया (5:25)। पति की बुलाहट अधिकार जताना नहीं, बलिदानी प्रेम है। यह रिश्ता मसीह और कलीसिया के गहरे भेद की तस्वीर है (5:32)।
  • बच्चे और माता-पिता (6:1-4): बच्चे प्रभु में माता-पिता की आज्ञा मानें। "हे पिताओ, अपने बच्चों को क्रोध न दिलाओ, पर प्रभु की शिक्षा और चेतावनी में उनका पालन-पोषण करो" (6:4)।
  • काम और अधिकार के रिश्ते (6:5-9): उस समय के सेवकों और स्वामियों से पौलुस कहता है कि सेवा मनुष्यों की नहीं, मसीह की सेवा समझकर करो, और स्वामी धमकी देना छोड़ें, क्योंकि उनका और सेवक का स्वामी स्वर्ग में है और वह पक्षपात नहीं करता (6:9)। आज यह नौकरी, कारोबार और हर अधिकार के रिश्ते पर लागू होता है।

फिर पत्र का अंतिम सन्देश: "प्रभु में और उसकी शक्ति के प्रभाव में बलवन्त बनो" (6:10)। हमारा युद्ध लहू और मांस से नहीं, बल्कि आत्मिक शक्तियों से है (6:12)। इसलिए परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लो:

  • कमर में सत्य का कमरबन्द
  • छाती पर धार्मिकता की झिलम
  • पाँवों में मेल के सुसमाचार की तैयारी की जूती
  • हाथ में विश्वास की ढाल
  • सिर पर उद्धार का टोप
  • और हाथ में आत्मा की तलवार, अर्थात् परमेश्वर का वचन (6:14-17)

और सब के ऊपर: "हर समय और हर प्रकार से आत्मा में प्रार्थना करते रहो", और सब पवित्र लोगों के लिए विनती करो (6:18)। पौलुस खुद प्रार्थना की माँग करता है कि वह साहस से सुसमाचार सुना सके (6:19-20)।

तुम्हारे घर के लिए: घर में सबसे बड़ी लड़ाई एक-दूसरे से नहीं, अंधकार की शक्तियों से है। इसलिए पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चे आपस में लड़ने के बजाय साथ मिलकर कवच पहनें और साथ मिलकर प्रार्थना करें।

3. तुम्हारे घर के लिए 3 काम

  1. एकता बनाए रखो और क्षमा करो (4:2-3, 26, 32) - आज तय करो कि कोई भी आपसी नाराज़गी सूरज ढलने तक नहीं टिकेगी। जिसे तुमसे ठेस पहुँची हो, उससे माफ़ी माँगो, और जिसने तुम्हें ठेस दी हो, उसे वैसे ही क्षमा करो जैसे मसीह ने तुम्हें क्षमा किया।

  2. घर के रिश्तों को मसीह के अनुसार बनाओ (5:21 - 6:4) - पति पत्नी के लिए बलिदानी प्रेम दिखाए, पत्नी आदर दे, बच्चे आज्ञाकारी हों और माता-पिता प्रेम और शिक्षा में पालन-पोषण करें। सब एक-दूसरे के अधीन रहें, क्योंकि मसीह सब का प्रभु है।

  3. आत्मिक हथियार पहनो और साथ में प्रार्थना करो (6:10-18) - हर सुबह घर के सब लोग मिलकर एक-एक हथियार का नाम लें और उसे बाँधने की प्रार्थना करें। सप्ताह में कम से कम एक बार पूरा परिवार एक-दूसरे और अपनी कलीसिया के लिए आत्मा में प्रार्थना करे।

आज की प्रार्थना:

"हे पिता, तूने हमें मसीह में हर आत्मिक आशीष दी है, इसके लिए तेरा धन्यवाद। हमारे मन की आँखें खोल, ताकि हम जान सकें कि हम कौन हैं और कितने प्रिय हैं। हमारे घर को अपना घराना और अपना मन्दिर बना, हमारे बीच की हर दीवार ढा दे, और हमें एक-दूसरे को क्षमा करना सिखा। अपनी शक्ति से हमें बलवन्त कर, और अपने सारे हथियार हमें पहना। आमीन।"

आज की घोषणा:

"मेरा घर परमेश्वर का घराना है! हम परदेशी नहीं, संगी नागरिक और परिवार के सदस्य हैं! हमें मसीह में हर आत्मिक आशीष मिली है! हम अनुग्रह से उद्धार पाए हैं, और भले कामों के लिए बनाए गए हैं! हम प्रभु में और उसकी शक्ति के प्रभाव में बलवन्त हैं!" (2:19, 1:3, 2:8-10, 6:10)

आज का कार्य:

आज परिवार के साथ बैठकर इफिसियों 2:8-22 पढ़ें। हर एक व्यक्ति कहे कि "मैं इस घराने का सदस्य हूँ, क्योंकि..." और अपनी गवाही दे। फिर सब हाथ पकड़कर 3:16-19 की प्रार्थना एक-दूसरे के लिए करें, और अंत में एक-दूसरे को क्षमा माँगने या क्षमा देने का अवसर लें।

"भाइयों को शान्ति और विश्वास सहित प्रेम, पिता परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह की ओर से मिले। जो हमारे प्रभु यीशु मसीह से अमरता के साथ प्रेम रखते हैं, उन सब पर अनुग्रह होता रहे।" (6:23-24)

शालोम,

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