पौलुस का तीसरा पत्र - गलातियों में,
मुख्य वचन:
"मसीह ने स्वतंत्रता के लिये हमें स्वतंत्र किया है; इसलिये स्थिर रहो और दासत्व के जूए में फिर न जुतो।" - गलातियों 5:1,
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1. पौलुस का तीसरा पत्र कौन सा है?
पौलुस का तीसरा पत्र है - गलातियों का पत्र। पहले दो पत्र थिस्सलुनीके को गए थे। (इस पत्र के लिखे जाने का ठीक समय विद्वानों में विवादित है। कुछ इसे ई. 48-49 का मानते हैं, कुछ 50 के दशक के मध्य का। हमारी श्रृंखला में इसे क्रम से तीसरा रखा गया है।)
यह सबसे विशेष है क्योंकि यह किसी एक कलीसिया को नहीं, "गलातिया की कलीसियाओं को" लिखा गया (1:2), यानी कई शहरों की छोटी-छोटी संगतियों को, जिन्हें पौलुस ने पहली यात्रा में शुरू किया था। उस समय कलीसियाएँ अधिकतर घरों में ही मिलती थीं।
पिछले दो पत्रों में पौलुस ने प्रोत्साहन दिया था। इस पत्र का स्वर बिलकुल अलग है। इसमें धन्यवाद से पहले ही चिंता और चोट है। वह कहता है: "मुझे आश्चर्य होता है कि जिसने तुम्हें मसीह के अनुग्रह से बुलाया, उससे तुम इतनी जल्दी फिरकर दूसरे सुसमाचार की ओर झुक रहे हो" (1:6)।
हुआ यह कि कुछ शिक्षक आकर सिखाने लगे कि मसीह पर विश्वास काफी नहीं, खतना और व्यवस्था के नियम भी ज़रूरी हैं। यानी सुसमाचार में "मसीह + कुछ और" जोड़ दिया गया। पौलुस ने इसे कोई छोटी बात नहीं माना, क्योंकि यहाँ सुसमाचार की नींव दाँव पर थी।
2. इस तीसरे पत्र का मुख्य संदेश क्या है?
इस पत्र का एक ही प्रश्न है - क्या हम मसीह के काम में अपने कामों से कुछ जोड़कर परमेश्वर को प्रसन्न कर सकते हैं? और उत्तर है: नहीं। मसीह ही काफी है।
पौलुस इसका उत्तर 4 भागों में देता है:
अ) सुसमाचार एक ही है (अध्याय 1-2)
पौलुस साफ कहता है कि कोई दूसरा सुसमाचार है ही नहीं (1:7)। और जो सुसमाचार उसने सुनाया, वह मनुष्य से नहीं, यीशु मसीह के प्रकाशन से मिला था (1:11-12)। इसलिए वह किसी को खुश करने के लिए उसे बदल नहीं सकता। "यदि मैं अब तक मनुष्यों को प्रसन्न करता रहता, तो मसीह का दास न होता" (1:10)।
अन्ताकिया में जब पतरस ने डर के मारे अन्यजाति विश्वासियों के साथ भोजन करना छोड़ दिया, तो पौलुस ने उसे सब के सामने टोका, क्योंकि यह सुसमाचार की सच्चाई के अनुसार सीधी चाल नहीं थी (2:11-14)। बड़े से बड़े अगुवा को भी वचन के सामने सुधरना पड़ता है।
फिर इस पत्र का हृदय आता है: "मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ; अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है" (2:20)। धर्मी ठहरना हमारे प्रयास से नहीं, मसीह में हुए इस मिलन से है।
तुम्हारे घर के लिए: अपने घर की भक्ति में देखो कि हम कहीं मसीह के ऊपर अपनी परम्पराएँ, नियम या दिखावा तो नहीं जोड़ रहे। हमारा उद्धार मसीह में है, हमारी सूची में नहीं।
ब) विश्वास से धर्मी, विश्वास से पुत्र (अध्याय 3-4)
पौलुस सीधा पूछता है: "तुमने आत्मा को व्यवस्था के कामों से पाया, या विश्वास के साथ सुनने से?" (3:2)। फिर वह अब्राहम को याद दिलाता है, जिसने परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर विश्वास किया और वह विश्वास उसके लिए धार्मिकता गिना गया (3:6)।
तो फिर व्यवस्था का क्या काम था? वह हमें मसीह तक पहुँचाने वाली शिक्षक और निगरानी करने वाली थी (3:24)। अब जब मसीह आ गया, तो हम उसकी निगरानी में नहीं, पिता के घर के पुत्र हैं। "अब तू दास नहीं, पुत्र है; और यदि पुत्र है, तो परमेश्वर के द्वारा वारिस भी" (4:7)। और उसी पुत्र का आत्मा हमारे हृदयों में पुकारता है, "हे अब्बा, हे पिता!" (4:6)।
और घरेलू कलीसिया के लिए इस पत्र की सबसे सुन्दर बात: "अब न कोई यहूदी रहा न यूनानी, न कोई दास न स्वतंत्र, न कोई नर न नारी; क्योंकि तुम सब मसीह यीशु में एक हो" (3:28)। घर की संगति में अमीर-गरीब, पढ़े-अनपढ़, बड़े-छोटे सब एक ही मेज़ पर बराबर हैं।
तुम्हारे घर के लिए: तुम्हारा घर दासों का नहीं, पुत्र-पुत्रियों का घर है। डर और हिसाब-किताब से नहीं, "अब्बा पिता" पुकारने वाले प्रेम से जियो। और अपनी संगति में किसी को छोटा या बड़ा मत ठहराओ।
स) स्वतंत्रता - पर किसलिए? (अध्याय 5:1-15)
"मसीह ने स्वतंत्रता के लिये हमें स्वतंत्र किया है" (5:1)। पर पौलुस तुरन्त सावधान करता है कि यह स्वतंत्रता शरीर की इच्छाओं के लिए अवसर नहीं है। यह तो प्रेम से एक-दूसरे की सेवा करने के लिए है (5:13)। सारी व्यवस्था एक वाक्य में पूरी होती है: "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख" (5:14)।
फिर एक कड़ी चेतावनी, जो छोटी संगतियों में बहुत काम की है: "यदि तुम एक-दूसरे को दाँत से काटते और फाड़ खाते हो, तो चौकस रहो कि एक-दूसरे का सत्यानाश न कर दो" (5:15)। जहाँ लोग पास-पास होते हैं, वहाँ चोट भी जल्दी लगती है।
तुम्हारे घर के लिए: स्वतंत्रता का मतलब मनमानी नहीं, सेवा है। घर की सभा में कौन सेवा कर रहा है, इसकी होड़ लगे, न कि कौन बड़ा है।
द) आत्मा में चलना और फल लाना (अध्याय 5:16 - 6:18)
पौलुस का उपाय सरल है: "आत्मा के अनुसार चलो, तो शरीर की लालसा पूरी न करोगे" (5:16)। शरीर और आत्मा के बीच सचमुच का संघर्ष है। शरीर के काम प्रकट हैं, और उनमें बैर, झगड़े, डाह, जलन और फूट भी गिनाए गए हैं (5:19-21)।
पर आत्मा का फल यह है: प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता और संयम (5:22-23)। ध्यान दीजिए, "फल" एकवचन है। यह नौ अलग-अलग काम नहीं, एक ही आत्मिक जीवन के नौ रंग हैं। और फल पेड़ के प्रयास से नहीं, डाली के जुड़े रहने से आता है।
फिर आत्मा में जीने का व्यावहारिक रूप आता है:
- कोई गलती में पकड़ा जाए तो उसे नम्रता की आत्मा से सम्भालो (6:1)
- एक-दूसरे के बोझ उठाओ, और इस प्रकार मसीह की व्यवस्था पूरी करो (6:2)
- जो बोओगे वही काटोगे (6:7)
- भलाई करने में हियाव न छोड़ो, क्योंकि समय पर फल काटोगे (6:9)
और अंत में पौलुस की सबसे बड़ी घोषणा: "मुझ से यह कभी न हो कि मैं किसी बात का घमण्ड करूँ, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का" (6:14)। न खतना कुछ है, न खतनारहित, केवल नई सृष्टि (6:15)।
तुम्हारे घर के लिए: घर में कोई गिर जाए, तो पहले सुधारने वाला नहीं, बोझ उठाने वाला बनो। और खुद से पूछो: हमारे घर में आत्मा का कौन-सा फल सबसे कम दिखता है?
3. तुम्हारे घर के लिए 3 काम
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सुसमाचार में कुछ जोड़ो मत, घटाओ मत (1:6-9, 2:16) - अपने घर की शिक्षा और रीतियों को इस कसौटी पर परखो: "क्या हम मसीह के काम के साथ अपने कामों को जोड़कर परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहते हैं?" उद्धार मसीह में पूरा है।
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आत्मा के अनुसार चलो और फल की खोज करो (5:16, 22-23) - रोज़ की प्रार्थना में आत्मा से माँगो कि वह हमारे घर में प्रेम, आनन्द, शान्ति और नम्रता का फल बढ़ाए। और शरीर के कामों, जैसे झगड़े और जलन, को पहचानकर पश्चाताप करो।
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एक-दूसरे के बोझ उठाओ (6:1-2, 9) - जो घर में थका है, गिरा है या पीछे रह गया है, उसे डाँटने की जगह सम्भालो। और भलाई करने में हार मत मानो, क्योंकि फल का समय आएगा।
आज की प्रार्थना:
"हे पिता, तेरे पुत्र के क्रूस के लिए तेरा धन्यवाद। हमारे घर को दासत्व और दिखावे से छुड़ा, और पुत्र-पुत्रियों की स्वतंत्रता में स्थिर कर। अपने आत्मा से हमें चला, हमारे बीच प्रेम, आनन्द और शान्ति का फल बढ़ा, और हमें एक-दूसरे के बोझ उठाना सिखा। आमीन।"
आज की घोषणा:
"मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, अब मैं नहीं, मसीह मुझ में जीवित है! मेरा घर दासों का नहीं, परमेश्वर की सन्तानों का घर है! हम आत्मा के अनुसार चलते हैं, एक-दूसरे के बोझ उठाते हैं, और केवल प्रभु यीशु के क्रूस पर घमण्ड करते हैं!" (2:20, 6:14)
आज का कार्य:
आज परिवार के साथ बैठकर गलातियों 5:16-26 पढ़ें। हर एक व्यक्ति आत्मा के फल की सूची में से एक फल चुने जिसकी उसे इस सप्ताह सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, और सब मिलकर एक-दूसरे के लिए उसी की प्रार्थना करें। फिर हर सदस्य किसी एक का बोझ उठाने का एक काम तय करे।
"हे भाइयो, हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह तुम्हारी आत्मा के साथ रहे।" (6:18)
शालोम,

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