पौलुस का पाँचवाँ पत्र - 2 कुरिन्थियों में,
मुख्य वचन:
"उसने मुझ से कहा, 'मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है, क्योंकि मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है।'" - 2 कुरिन्थियों 12:9,
1. पौलुस का पाँचवाँ पत्र कौन सा है?
पौलुस का पाँचवाँ पत्र है - 2 कुरिन्थियों का पत्र। इसे लगभग ई. 55-56 में मकिदुनिया से लिखा गया माना जाता है। पहले चार पत्र थिस्सलुनीके (दो), गलातिया और कुरिन्थुस (पहला) को गए थे।
यह पत्र पौलुस के सबसे व्यक्तिगत पत्रों में से एक है, क्योंकि इसमें उसका हृदय खुलकर सामने आता है। पहले पत्र के बाद कुरिन्थुस की कलीसिया से रिश्ता बिगड़ गया था। पौलुस को एक दुखद मुलाकात और आँसुओं से लिखा एक कड़ा पत्र भी भेजना पड़ा (2:1-4)। फिर तीतुस लौटकर अच्छी खबर लाया कि कलीसिया पश्चाताप में लौटी है (7:6-7)। उसी खबर से इस पत्र का जन्म हुआ।
साथ ही कुछ "बड़े-बड़े प्रेरित" कुरिन्थुस में आकर पौलुस पर सवाल उठा रहे थे कि वह कमज़ोर है, बोलने में साधारण है, और उसका अधिकार सच्चा नहीं (10:10, 11:5)। पौलुस को अपनी सेवकाई का बचाव करना पड़ा, पर उसने यह घमण्ड से नहीं, निर्बलता के सहारे किया।
कुरिन्थुस की कलीसिया घरों में मिलती थी (प्रेरितों 18:7, 1 कुरिन्थियों 16:19)। इसलिए यह पत्र उन सब घरों के लिए एक बड़ा सहारा है जहाँ लोग थके हुए हैं, आहत हैं या अपने आप को कमज़ोर महसूस करते हैं।
पहला कुरिन्थियों गड़बड़ियों का इलाज था। यह दूसरा पत्र टूटे हुए रिश्तों और थके हुए हृदयों का इलाज है।
2. इस पाँचवें पत्र का मुख्य संदेश क्या है?
इस पत्र का एक ही प्रश्न है - दुख, कमज़ोरी और टूटे रिश्तों के बीच परमेश्वर की सामर्थ्य कैसे काम करती है?
पौलुस इसका उत्तर 4 भागों में देता है:
अ) सान्त्वना - दुख में परमेश्वर की शान्ति (अध्याय 1-2, 7)
पत्र की शुरुआत ही शान्ति से होती है: "धन्य है हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता, जो दया का पिता और सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर है। वह हमारे सब क्लेशों में हमें शान्ति देता है, ताकि हम भी उस शान्ति के द्वारा, जो परमेश्वर हमें देता है, उन्हें शान्ति दे सकें जो किसी प्रकार के क्लेश में हों" (1:3-4)।
यहाँ शान्ति की एक पूरी धारा है: परमेश्वर हमें देता है, हम दूसरों को देते हैं। हमारा दुख भी बेकार नहीं जाता, वह दूसरों के लिए शान्ति का साधन बन जाता है।
पौलुस अपना दुख भी खोलकर रखता है। एशिया में वह इतना दबा कि जीवन से भी हाथ धो बैठा। पर इसका उद्देश्य था कि हम अपने पर नहीं, मरे हुओं को जिलाने वाले परमेश्वर पर भरोसा रखें (1:8-9)।
फिर वह टूटे रिश्ते को जोड़ने की बात करता है। जिसने पाप किया और पश्चाताप कर लिया, उसे क्षमा करो और शान्ति दो, कहीं वह अत्यधिक दुख में न डूब जाए (2:7)। और "सच्चा दुख" वह है जो पश्चाताप की ओर ले जाता है और पछताने की ज़रूरत नहीं छोड़ता (7:10)।
तुम्हारे घर के लिए: जब घर में कोई दुख से गुज़रे, तो उसे जल्दी नसीहत देने की जगह शान्ति दो। और अपने दुख को भी सोचो कि परमेश्वर उससे किसे शान्ति दिलाना चाहता है।
ब) सेवकाई - मिट्टी के बरतन में खज़ाना (अध्याय 3-5)
पौलुस कहता है कि हमारी योग्यता परमेश्वर की ओर से है, और यह नई वाचा की सेवा है, अक्षर की नहीं, आत्मा की; क्योंकि अक्षर मारता है, पर आत्मा जीवन देता है (3:6)। और जब हम प्रभु की महिमा को निहारते हैं, तो उसी के स्वरूप में बदलते जाते हैं (3:18)।
फिर पत्र की सबसे सुन्दर तस्वीर: "हमारे पास यह धन मिट्टी के बरतनों में है, ताकि यह असीम सामर्थ्य हमारी ओर से नहीं, परमेश्वर की ओर से ठहरे" (4:7)। हम टूटने वाले बरतन हैं, पर भीतर का खज़ाना मसीह है।
और तब पौलुस अपना अनुभव बताता है: हम चारों ओर से दबाए जाते हैं, पर कुचले नहीं जाते। घबराते हैं, पर निराश नहीं होते। सताए जाते हैं, पर त्यागे नहीं जाते। गिराए जाते हैं, पर नाश नहीं होते (4:8-9)। "यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्य नाश होता जाता है, तौभी हमारा भीतरी मनुष्य दिन-प्रतिदिन नया होता जाता है" (4:16)।
हमारी चाल "रूप को देखकर नहीं, विश्वास से" है (5:7)। और हमें चलाने वाली शक्ति है: "मसीह का प्रेम हमें विवश कर देता है" (5:14)।
इसके बाद पत्र का हृदय आता है: "यदि कोई मसीह में है, तो वह नई सृष्टि है; पुरानी बातें बीत गईं, देखो, वे सब नई हो गईं" (5:17)। परमेश्वर ने मसीह के द्वारा अपने साथ हमारा मेल कर लिया, और हमें मेल-मिलाप की सेवा सौंपी। इसलिए हम मसीह के राजदूत हैं (5:18-20)।
तुम्हारे घर के लिए: तुम्हारा घर साधारण मिट्टी का बरतन हो सकता है, पर भीतर मसीह का खज़ाना है। इसलिए शर्माओ मत। और अपने घर को मेल-मिलाप की जगह बनाओ, जहाँ क्षमा माँगना और क्षमा करना आसान हो।
स) उदारता - देना अनुग्रह का काम है (अध्याय 8-9)
पौलुस यरूशलेम के गरीब विश्वासियों के लिए सहायता जुटा रहा था। वह मकिदुनिया की कलीसियाओं की मिसाल देता है, जिन्होंने बहुत क्लेश और गहरी दरिद्रता में भी उदारता से दिया (8:2)। और यह इसलिए हुआ क्योंकि "पहले उन्होंने अपने आप को प्रभु को दिया" (8:5)। देना पैसे से नहीं, हृदय के समर्पण से शुरू होता है।
देने का सबसे बड़ा कारण है: "तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह जानते हो कि वह धनी होकर भी तुम्हारे लिये कंगाल बना, ताकि उसकी कंगाली से तुम धनी हो जाओ" (8:9)।
फिर देने के कुछ सूत्र:
- "थोड़ा बोने वाला थोड़ा काटेगा, और बहुत बोने वाला बहुत काटेगा" (9:6)
- "हर एक जैसा मन में ठाने वैसा दे, न कुढ़कर, न दबाव से; क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखता है" (9:7)
- "परमेश्वर हर प्रकार का अनुग्रह तुम्हें बहुतायत से दे सकता है" (9:8)
पौलुस यह भी ध्यान रखता है कि धन का लेन-देन पारदर्शी हो, ताकि प्रभु और मनुष्यों के सामने सम्मान बना रहे (8:20-21)।
तुम्हारे घर के लिए: देना सिर्फ धन का नहीं, समय, भोजन, घर के दरवाज़े और ध्यान का भी होता है। इसे बोझ नहीं, हर्ष की बात बनाओ।
द) सामर्थ्य - निर्बलता में सिद्ध (अध्याय 10-13)
जब झूठे प्रेरित अपनी बड़ाई कर रहे थे, तो पौलुस ने अपनी निर्बलताओं की सूची सुनाई: मार, कारावास, जहाज़ का टूटना, खतरे, भूख, प्यास, और कलीसियाओं की चिन्ता का रोज़ का बोझ (11:23-29)। उसने एक अद्भुत अनुभव भी बताया (12:1-4), पर उस पर घमण्ड नहीं किया।
फिर वह लिखता है कि उसके शरीर में एक काँटा दिया गया, जो उसे अभिमान से बचाए रखे। उसने तीन बार प्रभु से प्रार्थना की कि वह हट जाए (12:7-8)। (पौलुस ने यह नहीं बताया कि वह काँटा क्या था, इसलिए हम इसका अनुमान नहीं लगाते।)
प्रभु का उत्तर छुटकारा नहीं, इससे बढ़कर कुछ था: "मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है, क्योंकि मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है" (12:9)। तब पौलुस कहता है: "मैं अपनी निर्बलताओं पर और भी आनन्द से घमण्ड करूँगा, ताकि मसीह की सामर्थ्य मुझ पर छाया करती रहे... क्योंकि जब मैं निर्बल होता हूँ, तभी बलवन्त होता हूँ" (12:9-10)।
अन्त में वह कलीसिया से कहता है: "अपने आप को परखो कि विश्वास में हो या नहीं; अपने आप को जाँचो" (13:5)। और समापन के शब्द: "आनन्दित रहो, सिद्ध बनो, ढाढ़स पाओ, एक मन रहो और मेल से रहो; तब प्रेम और शान्ति का परमेश्वर तुम्हारे साथ होगा" (13:11)।
तुम्हारे घर के लिए: अपनी कमज़ोरियों को छिपाने की जगह प्रभु के सामने खोलो। घर में कोई अपने को कमज़ोर कहे, तो उसकी हँसी मत उड़ाओ। परमेश्वर की सामर्थ्य ठीक वहीं दिखती है जहाँ हम अपनी सीमा मान लेते हैं।
3. तुम्हारे घर के लिए 3 काम
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शान्ति पाओ और शान्ति दो (1:3-4) - इस सप्ताह किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढो जो दुख से गुज़र रहा है। जिस दुख में से परमेश्वर ने तुम्हें निकाला है, उसी अनुभव से उसे ढाढ़स दो।
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निर्बलता में प्रभु की सामर्थ्य पर भरोसा करो (12:9-10) - घर में हर एक अपनी एक कमज़ोरी प्रभु को सौंपे, और बाकी सब उसके लिए प्रार्थना करें। मिट्टी के बरतन को शर्मिंदा न करो, क्योंकि खज़ाना उसके भीतर है।
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हर्ष से देने वाले बनो (9:7) - इस महीने अपने घर से किसी ज़रूरतमंद की सहायता करो: भोजन, समय या धन से। बच्चों को भी साथ में शामिल करो, ताकि वे देना सीखें।
आज की प्रार्थना:
"हे दया के पिता और शान्ति के परमेश्वर, दुखों में हमें शान्ति दे, ताकि हम औरों को शान्ति दे सकें। हमें अपनी कमज़ोरियों में तेरी सामर्थ्य देखना सिखा। हमारे घर को मेल-मिलाप और उदारता का घर बना, और मसीह के प्रेम से हमें चला। आमीन।"
आज की घोषणा:
"मैं मसीह में नई सृष्टि हूँ! पुरानी बातें बीत गईं, सब नई हो गईं! मेरा घर मिट्टी का बरतन है, पर भीतर मसीह का खज़ाना है! परमेश्वर का अनुग्रह हमारे लिए बहुत है, और जब हम निर्बल हैं, तभी बलवन्त हैं!" (5:17, 4:7, 12:9-10)
आज का कार्य:
आज परिवार के साथ बैठकर 2 कुरिन्थियों 4:7-18 पढ़ें। हर एक व्यक्ति बताए कि "किस दबाव या कमज़ोरी में मुझे परमेश्वर की सामर्थ्य चाहिए?" फिर सब मिलकर एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करें, और एक-दूसरे के लिए 1:3-4 के अनुसार शान्ति माँगें।
"प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह, परमेश्वर का प्रेम और पवित्र आत्मा की सहभागिता तुम सब के साथ रहे।" (13:14, भावार्थ)
शालोम,

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