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Showing posts from September, 2026

पौलुस का नौवाँ पत्र - कुलुस्सियों में,

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मुख्य वचन: "जैसे तुमने मसीह यीशु को प्रभु करके ग्रहण किया, वैसे ही उसी में चलते रहो; उसी में जड़ पकड़े हुए और उसी में बढ़ते हुए, और विश्वास में दृढ़ होते जाओ।" - कुलुस्सियों 2:6-7,  1. पौलुस का नौवाँ पत्र कौन सा है? पौलुस का नौवाँ पत्र है - कुलुस्सियों का पत्र। पिछले आठ पत्र थिस्सलुनीके (दो), गलातिया, कुरिन्थुस (दो), रोम, इफिसुस और फिलिप्पी को गए थे। यह पत्र भी पौलुस ने कैद में रहते हुए लिखा (4:3, 10, 18), परम्परा के अनुसार रोम की कैद से, लगभग ई. 60-62 में। इसे तुखिकुस और उनेसिमुस के हाथ भेजा गया (4:7-9)। (कैद के पत्रों का क्रम विद्वानों में अलग-अलग माना जाता है, इसलिए हम बाइबल में आने का क्रम ले रहे हैं।) कुलुस्से आज के तुर्की में एक छोटा-सा शहर था। यह इस पत्र की एक खास बात है, क्योंकि रोम की कलीसिया की तरह ही पौलुस इस कलीसिया में भी कभी नहीं गया था (2:1)। यहाँ सुसमाचार एपफ्रास लेकर आया था, जो पौलुस का प्रिय सहकर्मी और मसीह का विश्वासयोग्य सेवक था (1:7)। एपफ्रास ने ही कैद में पौलुस को कुलुस्से की खबर सुनाई। यह कलीसिया घरों में मिलती थी। इसी पत्र में साफ लिखा है ...

पौलुस का आठवाँ पत्र - फिलिप्पियों में,

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मुख्य वचन: "किसी भी बात की चिन्ता मत करो; हर बात में प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ अपनी बिनती परमेश्वर के सामने प्रस्तुत करो। तब परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।" - फिलिप्पियों 4:6-7,  1. पौलुस का आठवाँ पत्र कौन सा है? यह पौलुस का आठवाँ पत्र है - फिलिप्पियों का पत्र। पिछले सात पत्र थिस्सलुनीके (दो), गलातिया, कुरिन्थुस (दो), रोम और इफिसुस को गए थे। यह पत्र भी पौलुस ने कैद में रहते हुए लिखा (1:7, 13), परम्परा के अनुसार रोम की कैद से, लगभग ई. 61-62 में। (कैद के पत्रों का ठीक क्रम और स्थान विद्वानों में अलग-अलग माना जाता है, इसलिए हम बाइबल में आने का क्रम ले रहे हैं।) पर इसमें कैद की उदासी नहीं, एक अद्भुत बात है: "आनन्द" और "आनन्दित होना" शब्द इस छोटे-से पत्र में बार-बार आते हैं। फिलिप्पी मकिदुनिया का एक रोमी उपनिवेश था, और यहीं पौलुस ने यूरोप में पहली बार सुसमाचार सुनाया (प्रेरितों 16)। इस कलीसिया की शुरुआत ही घरों से हुई: लुदिया नाम की एक व्यापारी स्त...

पौलुस का सातवाँ पत्र - इफिसियों में,

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मुख्य वचन: "अब तुम परदेशी और अजनबी नहीं रहे, पर पवित्र लोगों के संगी नागरिक और परमेश्वर के घराने के सदस्य हो।" - इफिसियों 2:19, 1. पौलुस का सातवाँ पत्र कौन सा है? पौलुस का सातवाँ पत्र है - इफिसियों का पत्र। पिछले छह पत्र थिस्सलुनीके (दो), गलातिया, कुरिन्थुस (दो) और रोम को गए थे। यह पत्र पौलुस ने कैद में रहते हुए लिखा, माना जाता है कि रोम की कैद से, लगभग ई. 60-62 में। वह खुद को "प्रभु में बन्दी" कहता है (4:1), और अपने बारे में लिखता है कि "मैं जंजीर में बँधा हुआ राजदूत हूँ" (6:20)। पत्र तुखिकुस के हाथ भेजा गया (6:21)। (कैद के दिनों के पत्रों का ठीक क्रम विद्वानों में अलग-अलग माना जाता है। हमारी श्रृंखला में हम बाइबल में आने के लोकप्रिय क्रम को ले रहे हैं।) इफिसुस एशिया का बड़ा शहर था, जहाँ पौलुस ने लगभग तीन वर्ष सेवकाई की थी (प्रेरितों 20:31)। वहाँ अक्विला और प्रिस्का का घर भी कलीसिया के मिलने की जगह था (1 कुरिन्थियों 16:19)। कुछ प्राचीन प्रतियों में पद 1:1 में "इफिसुस में" शब्द नहीं मिलते, इसलिए कई विद्वान मानते हैं कि यह पत्र आस-पास क...

पौलुस का छठा पत्र - रोमियों में,

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मुख्य वचन: "क्योंकि मैं सुसमाचार से नहीं लजाता, इसलिए कि वह हर एक विश्वास करने वाले के लिये परमेश्वर की सामर्थ्य है।" - रोमियों 1:16  1. पौलुस का छठा पत्र कौन सा है? पौलुस का छठा पत्र है - रोमियों का पत्र। इसे लगभग ई. 57 में कुरिन्थुस से लिखा गया माना जाता है। इस श्रृंखला के पिछले पाँच पत्र थिस्सलुनीके (दो), गलातिया और कुरिन्थुस (दो) को गए थे। यह सबसे विशेष है क्योंकि पहले पाँच पत्र उन कलीसियाओं को लिखे गए थे जिन्हें पौलुस जानता था और जिनमें से कई उसने खुद शुरू की थीं। पर रोम की कलीसिया को पौलुस ने शुरू नहीं किया था, और वह तब तक वहाँ गया भी नहीं था (1:10-13)। रोम दुनिया की राजधानी था। वहाँ विश्वासी घरों में मिलते थे, और यह इसी पत्र में साफ लिखा है। पौलुस अक्विला और प्रिस्का को नमस्कार भेजता है और "उनके घर की कलीसिया" को भी (16:3-5)। आगे और भी समूहों के नाम आते हैं (16:14-15)। पत्र लिखे जाते समय कुरिन्थुस में गयुस का घर था, जो पौलुस का और "सारी कलीसिया का" पहुनाई करने वाला था (16:23)। और पत्र की लिपिक थी तिरतियुस , जिसने पौलुस के बोले शब्द लिखे ...

पौलुस का पाँचवाँ पत्र - 2 कुरिन्थियों में,

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मुख्य वचन: "उसने मुझ से कहा, 'मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है, क्योंकि मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है।'" - 2 कुरिन्थियों 12:9,  1. पौलुस का पाँचवाँ पत्र कौन सा है? पौलुस का पाँचवाँ पत्र है - 2 कुरिन्थियों का पत्र। इसे लगभग ई. 55-56 में मकिदुनिया से लिखा गया माना जाता है। पहले चार पत्र थिस्सलुनीके (दो), गलातिया और कुरिन्थुस (पहला) को गए थे। यह पत्र पौलुस के सबसे व्यक्तिगत पत्रों में से एक है, क्योंकि इसमें उसका हृदय खुलकर सामने आता है। पहले पत्र के बाद कुरिन्थुस की कलीसिया से रिश्ता बिगड़ गया था। पौलुस को एक दुखद मुलाकात और आँसुओं से लिखा एक कड़ा पत्र भी भेजना पड़ा (2:1-4)। फिर तीतुस लौटकर अच्छी खबर लाया कि कलीसिया पश्चाताप में लौटी है (7:6-7)। उसी खबर से इस पत्र का जन्म हुआ। साथ ही कुछ "बड़े-बड़े प्रेरित" कुरिन्थुस में आकर पौलुस पर सवाल उठा रहे थे कि वह कमज़ोर है, बोलने में साधारण है, और उसका अधिकार सच्चा नहीं (10:10, 11:5)। पौलुस को अपनी सेवकाई का बचाव करना पड़ा, पर उसने यह घमण्ड से नहीं, निर्बलता के सहारे किया। कुरिन्थुस की कलीसिया घरों ...

पौलुस का चौथा पत्र - 1 कुरिन्थियों में,

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मुख्य वचन: "तुम सब मसीह की देह हो, और अलग-अलग उसके अंग हो।" - 1 कुरिन्थियों 12:27,  1. पौलुस का चौथा पत्र कौन सा है? पौलुस का चौथा पत्र है - 1 कुरिन्थियों का पत्र। इसे लगभग ई. 55 में इफिसुस से लिखा गया माना जाता है (16:8)। पहले तीन पत्र थिस्सलुनीके (दो) और गलातिया को गए थे। कुरिन्थुस यूनान का बड़ा, समृद्ध और बंदरगाह वाला शहर था, जो अपनी भोग-विलास की संस्कृति के लिए भी जाना जाता था। पौलुस ने वहाँ डेढ़ वर्ष सेवकाई की थी (प्रेरितों 18)। उसके जाने के बाद कलीसिया में एक के बाद एक समस्याएँ उठ खड़ी हुईं। इस पत्र की शुरुआत भी एक खबर से हुई। "क्लोई के घराने के लोगों" ने पौलुस को बताया कि तुम्हारे बीच झगड़े हैं (1:11)। साथ ही कलीसिया ने कुछ प्रश्न भी लिखकर भेजे थे (7:1)। घरेलू कलीसिया के लिए यह पत्र खास है, क्योंकि इसमें यह बात साफ लिखी है: "अक्विला और प्रिस्का अपने घर की कलीसिया समेत तुम्हें प्रभु में बहुत नमस्कार कहते हैं" (16:19)। स्तिफनास का पूरा घराना भी सेवा में लगा हुआ था (16:15)। यानी यह पत्र घरों में मिलने वाली कलीसिया को ही लिखा गया है। पिछले ...

पौलुस का तीसरा पत्र - गलातियों में,

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मुख्य वचन: "मसीह ने स्वतंत्रता के लिये हमें स्वतंत्र किया है; इसलिये स्थिर रहो और दासत्व के जूए में फिर न जुतो।" - गलातियों 5:1,  1. पौलुस का तीसरा पत्र कौन सा है? पौलुस का तीसरा पत्र है - गलातियों का पत्र। पहले दो पत्र थिस्सलुनीके को गए थे। (इस पत्र के लिखे जाने का ठीक समय विद्वानों में विवादित है। कुछ इसे ई. 48-49 का मानते हैं, कुछ 50 के दशक के मध्य का। हमारी श्रृंखला में इसे क्रम से तीसरा रखा गया है।) यह सबसे विशेष है क्योंकि यह किसी एक कलीसिया को नहीं, "गलातिया की कलीसियाओं को" लिखा गया (1:2), यानी कई शहरों की छोटी-छोटी संगतियों को, जिन्हें पौलुस ने पहली यात्रा में शुरू किया था। उस समय कलीसियाएँ अधिकतर घरों में ही मिलती थीं। पिछले दो पत्रों में पौलुस ने प्रोत्साहन दिया था। इस पत्र का स्वर बिलकुल अलग है। इसमें धन्यवाद से पहले ही चिंता और चोट है। वह कहता है: "मुझे आश्चर्य होता है कि जिसने तुम्हें मसीह के अनुग्रह से बुलाया, उससे तुम इतनी जल्दी फिरकर दूसरे सुसमाचार की ओर झुक रहे हो" (1:6)। हुआ यह कि कुछ शिक्षक आकर सिखाने लगे कि मसीह पर विश्वास क...

पौलुस का दूसरा पत्र - 2 थिस्सलुनीकियों में,

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मुख्य वचन: "प्रभु विश्वासयोग्य है; वह तुम्हें दृढ़ करेगा और उस दुष्ट से बचाए रखेगा।" - 2 थिस्सलुनीकियों 3:3,  1. पौलुस का दूसरा पत्र कौन सा है? पौलुस का दूसरा पत्र है - 2 थिस्सलुनीकियों का पत्र। इसे पहले पत्र के कुछ ही समय बाद, लगभग ई. 51 में, कुरिन्थुस से लिखा गया माना जाता है। यह उसी कलीसिया को लिखा गया जिसे पहले पत्र में पौलुस ने थामा था। पहले पत्र के बाद दो बातें हुईं। सताव और बढ़ गया। और कुछ लोगों ने यह अफवाह फैला दी कि "प्रभु का दिन आ चुका है" (2:2), जिससे विश्वासी घबरा गए। कुछ लोग यह सोचकर कि प्रभु आने ही वाला है, काम छोड़कर बैठ गए (3:11)। इसलिए पहला पत्र समझो नींव है (विश्वास, प्रेम, आशा), और यह दूसरा पत्र स्थिरता है: दुख में डटे रहना, अफवाहों में न बहना, और व्यवस्थित जीवन जीना। घर की कलीसिया के लिए यह पत्र बहुत काम का है, क्योंकि छोटी संगतियों में अफवाहें, डर और ढीलापन सबसे जल्दी घुसते हैं। 2. इस दूसरे पत्र का मुख्य संदेश क्या है? इस पत्र का एक ही प्रश्न है - सताव, भ्रम और ढीलेपन के बीच कलीसिया प्रभु में स्थिर कैसे रहे? पौलुस इसका उत्तर 4 भा...

पौलुस का पहला पत्र - 1 थिस्सलुनीकियों में,

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मुख्य वचन : "हम अपने परमेश्वर और पिता के सामने तुम्हारे विश्वास के काम, प्रेम के परिश्रम और आशा के धीरज को लगातार स्मरण करते हैं।" - 1 थिस्सलुनीकियों 1:3,  1. पौलुस का पहला पत्र कौन सा है? पौलुस का पहला पत्र है - 1 थिस्सलुनीकियों का पत्र। इसे लगभग ई. 50-51 में कुरिन्थुस से लिखा गया माना जाता है। यह सबसे विशेष है क्योंकि इसे पौलुस ने ऐसी कलीसिया को लिखा जिसे उसने बहुत थोड़े समय पहले शुरू किया था। विरोध के कारण उसे अचानक शहर छोड़ना पड़ा था। थिस्सलुनीके मकिदुनिया का बड़ा व्यापारिक शहर था। पौलुस की टोली वहाँ यासोन के घर ठहरी थी, और भीड़ ने उसी घर पर हमला किया (प्रेरितों 17:5-7)। उस समय कलीसिया के लिए अलग भवन नहीं होते थे, इसलिए विश्वासी घरों में ही मिलते थे। यानी वहाँ घरेलू कलीसिया थी: न भवन, न अनुभवी अगुवा, और ऊपर से सताव। पौलुस को चिंता थी कि इतनी नई कलीसिया कहीं टूट न जाए। उसने तीमुथियुस को भेजा। जब वह अच्छी खबर लाया कि वे विश्वास और प्रेम में दृढ़ हैं, तब पौलुस ने यह पत्र लिखा (3:6)। यह पत्र एक पिता की चिट्ठी है, जो अपने नए बच्चों को थामे रखने के लिए लिखी गई है। 2. इस पह...