पौलुस का छठा पत्र - रोमियों में,

मुख्य वचन:

"क्योंकि मैं सुसमाचार से नहीं लजाता, इसलिए कि वह हर एक विश्वास करने वाले के लिये परमेश्वर की सामर्थ्य है।" - रोमियों 1:16 

1. पौलुस का छठा पत्र कौन सा है?

पौलुस का छठा पत्र है - रोमियों का पत्र। इसे लगभग ई. 57 में कुरिन्थुस से लिखा गया माना जाता है। इस श्रृंखला के पिछले पाँच पत्र थिस्सलुनीके (दो), गलातिया और कुरिन्थुस (दो) को गए थे।

यह सबसे विशेष है क्योंकि पहले पाँच पत्र उन कलीसियाओं को लिखे गए थे जिन्हें पौलुस जानता था और जिनमें से कई उसने खुद शुरू की थीं। पर रोम की कलीसिया को पौलुस ने शुरू नहीं किया था, और वह तब तक वहाँ गया भी नहीं था (1:10-13)।

रोम दुनिया की राजधानी था। वहाँ विश्वासी घरों में मिलते थे, और यह इसी पत्र में साफ लिखा है। पौलुस अक्विला और प्रिस्का को नमस्कार भेजता है और "उनके घर की कलीसिया" को भी (16:3-5)। आगे और भी समूहों के नाम आते हैं (16:14-15)। पत्र लिखे जाते समय कुरिन्थुस में गयुस का घर था, जो पौलुस का और "सारी कलीसिया का" पहुनाई करने वाला था (16:23)। और पत्र की लिपिक थी तिरतियुस, जिसने पौलुस के बोले शब्द लिखे (16:22)। माना जाता है कि यह पत्र फीबे के हाथ रोम पहुँचा, जिसे पौलुस ने कलीसिया की सेविका कहकर भेजा (16:1-2)।

रोम में यहूदी और अन्यजाति विश्वासी साथ थे, और उनके बीच खाने-पीने, दिनों और परम्पराओं को लेकर खिंचाव था (अध्याय 14)। और पौलुस की योजना रोम होते हुए स्पेन तक सुसमाचार पहुँचाने की थी (15:24)।

इसलिए पौलुस ने इस पत्र में किसी एक समस्या का उत्तर नहीं, बल्कि पूरे सुसमाचार की नींव विस्तार से लिख दी, ताकि रोम की कलीसिया तैयार हो जाए।

पहले पाँच पत्र ज़्यादातर समस्याओं की दवा थे। यह छठा पत्र पूरे शरीर के लिए भोजन है।

2. इस छठे पत्र का मुख्य संदेश क्या है?

इस पत्र का एक ही प्रश्न है - पापी मनुष्य पवित्र परमेश्वर के सामने धर्मी कैसे ठहर सकता है?

पौलुस इसका उत्तर 5 भागों में देता है:

अ) निदान - सब पापी हैं (अध्याय 1:18 - 3:20)

पौलुस पहले बुरी खबर देता है। परमेश्वर का क्रोध उन पर है जो सत्य को अधर्म से दबाए रखते हैं (1:18)। फिर वह तीनों तरह के लोगों को कटघरे में खड़ा करता है: अधर्मी अन्यजाति (अध्याय 1), नैतिक दिखने वाला दूसरों को दोष देने वाला (अध्याय 2), और धार्मिक यहूदी (2:17 से)। सब का निष्कर्ष एक है: "कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं" (3:10)। "सब ने पाप किया और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं" (3:23)।

पर इसी भाग में एक चेतावनी भी है: "तू जो दूसरों पर दोष लगाता है, वही काम स्वयं करता है" (2:1)। जो दूसरों की भूल देखता है, वह अपने भीतर देखने से बचता है।

तुम्हारे घर के लिए: जब तक हम यह न मानें कि हम सब पापी हैं, उद्धार शुरू नहीं होता। घर में पहले अपनी गलती मानने वाला बनो, दूसरों की गिनने वाला नहीं।

ब) उपाय - विश्वास से धर्मी ठहरना (अध्याय 3:21 - 5)

अब खुशखबरी आती है। "परन्तु अब व्यवस्था से अलग परमेश्वर की धार्मिकता प्रगट हुई है... यीशु मसीह पर विश्वास करने से" (3:21-22)। और सब "उसके अनुग्रह से, उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, सेंतमेंत धर्मी ठहराए जाते हैं" (3:24)। "मनुष्य व्यवस्था के कामों से नहीं, पर विश्वास करने से धर्मी ठहरता है" (3:28)।

पौलुस अब्राहम की मिसाल देता है, जिसने परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर भरोसा किया और यह उसके लिए धार्मिकता गिना गया (4:3)। धर्मी ठहरने का मतलब है कि परमेश्वर हमें निर्दोष घोषित करता है, हमारे कामों के कारण नहीं, मसीह के कारण।

इसके परिणाम भी तुरंत आते हैं: "हमें परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप मिला है" (5:1)। और उसका प्रेम पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों में उंडेला गया है (5:5)। सबसे बड़ा प्रमाण यह है: "जब हम पापी ही थे, तभी मसीह हमारे लिये मरा" (5:8)। उसने हमारे सुधरने का इंतज़ार नहीं किया। जहाँ पाप बढ़ा, वहाँ अनुग्रह उससे भी अधिक बढ़ा (5:20)।

तुम्हारे घर के लिए: तुम्हारा घर अपने अच्छे कामों से नहीं, केवल यीशु के लहू पर विश्वास से धर्मी है। घर में यह डर मत रखो कि "हम काफी अच्छे नहीं"। हम अपने कामों पर नहीं, उसके अनुग्रह पर खड़े हैं।

स) परिणाम - नया जीवन (अध्याय 6-8)

क्या अनुग्रह का मतलब है कि हम पाप में बने रहें? पौलुस कहता है: "कदापि नहीं! हम जो पाप के लिये मर गए, फिर उसमें कैसे जीवन बिताएँ?" (6:1-2)। हम मसीह के साथ गाड़े गए और उसके साथ जी उठे, ताकि "नए जीवन की सी चाल चलें" (6:4)। पाप की मज़दूरी मृत्यु है, पर परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु यीशु मसीह में अनन्त जीवन है (6:23)।

अध्याय 7 ईमानदार संघर्ष की तस्वीर है। पौलुस स्वीकार करता है कि जो भला चाहता हूँ वह नहीं करता, और जो बुरा नहीं चाहता वही करता हूँ (7:19)। वह चीख उठता है: "मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?" (7:24)। और उत्तर तुरंत आता है: "हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो।" (7:25)

फिर अध्याय 8, जो इस पत्र का शिखर है:

  • "अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं" (8:1)
  • जो आत्मा के अनुसार चलते हैं, वे जीवन और शान्ति पाते हैं (8:6)
  • जितने परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं, वे परमेश्वर के पुत्र हैं। तुमने दासत्व की आत्मा नहीं पाई, पर लेपालक पुत्र होने की आत्मा पाई, जिससे हम पुकारते हैं, "हे अब्बा, हे पिता!" (8:14-15)
  • आत्मा हमारी दुर्बलता में सहायता करता है, और जब हम नहीं जानते कि क्या माँगें, तब वह हमारे लिए बिन शब्दों की आहों से विनती करता है (8:26)
  • "सब बातें मिलकर उन के लिये भलाई ही उत्पन्न करती हैं जो परमेश्वर से प्रेम रखते हैं" (8:28)
  • और अंत की घोषणा: "कौन हमें मसीह के प्रेम से अलग करेगा?" न क्लेश, न संकट, न सताव, न मृत्यु, न जीवन, कोई भी सृष्ट वस्तु (8:35-39)

तुम्हारे घर के लिए: तुम्हारा घर डर का घर नहीं, आत्मा के द्वारा जीने वाला घर है। संघर्ष के क्षणों में भी याद रखो कि दण्ड की आज्ञा नहीं है, और जब प्रार्थना के शब्द नहीं मिलते, तब भी आत्मा हमारे लिए विनती करता है।

द) परमेश्वर की विश्वासयोग्यता (अध्याय 9-11)

पौलुस का हृदय अपने यहूदी भाइयों के लिए भारी है (9:1-3)। सवाल उठता है कि क्या परमेश्वर की प्रतिज्ञा टूट गई? पौलुस के लिए उत्तर है, नहीं। परमेश्वर की योजना उसकी दया और उसकी सम्प्रभुता पर टिकी है, हमारे प्रयास पर नहीं।

इसी भाग में उद्धार का सीधा मार्ग बताया गया है: "यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे और अपने हृदय से विश्वास करे कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू उद्धार पाएगा" (10:9)। और "जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा" (10:13)।

फिर एक ज़रूरी सवाल: "बिना प्रचारक के वे कैसे सुनें?" (10:14)। यह घरेलू कलीसिया की बुलाहट है कि सुसमाचार जाए।

अध्याय 11 में पौलुस को भरोसा है कि परमेश्वर ने अपने लोगों को त्यागा नहीं है, और अन्यजातियों को चेताता है कि घमण्ड मत करो, तुम जड़ को नहीं, जड़ तुम्हें सम्भालती है (11:18)। और अंत में वह आराधना में फूट पड़ता है: "आहा! परमेश्वर का धन और बुद्धि और ज्ञान क्या ही गम्भीर है!... उसी की ओर से, और उसी के द्वारा, और उसी के लिये सब कुछ है। उसकी महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन।" (11:33-36)

तुम्हारे घर के लिए: जो बातें हम नहीं समझ पाते, वहाँ भी परमेश्वर विश्वासयोग्य है। और अपने घर के बाहर बसे लोगों तक सुसमाचार पहुँचाने की बुलाहट को टालो मत।

य) प्रमाण - जीवन में दिखना (अध्याय 12-16)

पत्र का मोड़ यहाँ है: "इसलिये, हे भाइयो, परमेश्वर की दया स्मरण दिलाकर मैं तुम से विनती करता हूँ कि अपने शरीरों को जीवित, पवित्र और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ; यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है" (12:1)। "इस संसार के सदृश न बनो, पर मन के नए हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए" (12:2)। सुसमाचार सिर्फ सुनना नहीं, जीना है।

फिर घरेलू कलीसिया की जीवन-शैली:

  • एक देह, अनेक अंग: हर एक को अपने वरदान से सेवा करनी है (12:4-8)
  • निष्कपट प्रेम, भाईचारे की प्रीति और आदर में एक-दूसरे से बढ़कर होना (12:9-10)
  • "आनन्द करने वालों के साथ आनन्द करो, और रोने वालों के साथ रोओ" (12:15)
  • "जहाँ तक हो सके, सब मनुष्यों के साथ मेल-मिलाप रखो" (12:18)
  • "बुराई से न हारो, बरन भलाई से बुराई को जीत लो" (12:21)
  • "आपस के प्रेम को छोड़ और किसी बात में किसी के कर्ज़दार न हो" (13:8)

फिर अध्याय 14-15, जो रोम की घरेलू कलीसियाओं के बीच के तनाव का सीधा जवाब हैं:

  • "जो विश्वास में निर्बल है, उसे अपनी संगति में ले लो" (14:1)
  • "हम आगे को एक-दूसरे पर दोष न लगाएँ" (14:13)
  • "परमेश्वर का राज्य खाना-पीना नहीं, पर धार्मिकता, मेल-मिलाप और पवित्र आत्मा में आनन्द है" (14:17)
  • बलवान निर्बलों की निर्बलताएँ उठाएँ, और अपने ही को प्रसन्न न करें (15:1)
  • "एक-दूसरे को ग्रहण करो, जैसे मसीह ने भी तुम्हें ग्रहण किया" (15:7)

"आशा का परमेश्वर तुम्हें विश्वास करने में सब प्रकार के आनन्द और शान्ति से परिपूर्ण करे, ताकि पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से तुम्हारी आशा बढ़ती जाए" (15:13)।

और पत्र का अन्त ही घरेलू कलीसिया की तस्वीर है। पौलुस बहुत से लोगों के नाम लेकर धन्यवाद देता है: फीबे, प्रिस्का और अक्विला "जिन्होंने मेरे प्राण के लिये अपना सिर दे रखा था", और अनेक भाई-बहन। सुसमाचार नाम लेकर लोगों को याद रखता है।

तुम्हारे घर के लिए: सुसमाचार सोमवार को भी जीना है। घर में कठिन विचार वाले या अलग परम्परा वाले लोगों को बहस से नहीं, मसीह की तरह ग्रहण करने से जीतो।

3. तुम्हारे घर के लिए 3 काम

  1. सुसमाचार को रोज़ कहो (1:16) - अपने बच्चों को रोज़ याद दिलाओ कि हम अपने कामों से नहीं, मसीह से धर्मी हैं। खाने की मेज़, स्कूल भेजते समय या सोने से पहले सुसमाचार दोहराओ, और जब कोई अपनी गलती से टूटा हो, तब खास तौर पर।

  2. एक-दूसरे को दोषी ठहराना बंद करो (14:13) - रोम में यहूदी और अन्यजाति एक-दूसरे को जज करते थे। आज से घर में यह बंद करो। किसी की कमज़ोरी को उसके विरुद्ध हथियार मत बनाओ, क्योंकि हम सब अनुग्रह से ही खड़े हैं।

  3. एक मन हो जाओ (15:5-7) - "ताकि तुम एक मन और एक मुँह होकर हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता परमेश्वर की स्तुति करो।" जब घर एक मन होकर मसीह की बड़ाई करता है, तब बाहर के लोग वहाँ सुसमाचार को देखते हैं। एक-दूसरे को वैसे ही अपनाओ जैसे मसीह ने तुम्हें अपनाया।

आज की प्रार्थना:

"हे पिता, हमारे घर को फिर से सुसमाचार की नींव पर स्थापित कर। हमें याद दिला कि हम अपने कामों से नहीं, तेरे पुत्र के लहू से धर्मी ठहरे हैं। हमारे बीच दोष लगाने की आदत को मिटा, हमें एक-दूसरे को अपनाना सिखा, और अपने आत्मा से हमें डर से निकालकर 'अब्बा, पिता' पुकारने वाला बना। आमीन।"

आज की घोषणा:

"मेरा घर अपने कामों से नहीं, विश्वास से धर्मी ठहरा है! मेरे घर पर कोई दण्ड की आज्ञा नहीं है, क्योंकि हम मसीह यीशु में हैं! कोई भी बात हमें परमेश्वर के प्रेम से अलग नहीं कर सकती! मेरा घर सुसमाचार से नहीं लजाता, वह सुसमाचार को जीता है!" (1:16, 8:1, 8:38-39)

आज का कार्य:

आज परिवार के साथ बैठकर रोमियों अध्याय 8 पढ़ें। हर एक व्यक्ति अपनी गवाही दे - "परमेश्वर ने मुझे कैसे धर्मी ठहराया?" फिर हर सदस्य किसी एक व्यक्ति का नाम लेकर धन्यवाद दे, जैसे पौलुस ने अध्याय 16 में लिया, और सब मिलकर 15:13 की प्रार्थना एक-दूसरे के लिए करें।

"उस अद्वैत बुद्धिमान परमेश्वर की यीशु मसीह के द्वारा युगानुयुग महिमा होती रहे। आमीन।" (16:27)

शालोम,

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