पौलुस का चौथा पत्र - 1 कुरिन्थियों में,
मुख्य वचन:
"तुम सब मसीह की देह हो, और अलग-अलग उसके अंग हो।" - 1 कुरिन्थियों 12:27,
1. पौलुस का चौथा पत्र कौन सा है?
पौलुस का चौथा पत्र है - 1 कुरिन्थियों का पत्र। इसे लगभग ई. 55 में इफिसुस से लिखा गया माना जाता है (16:8)। पहले तीन पत्र थिस्सलुनीके (दो) और गलातिया को गए थे।
कुरिन्थुस यूनान का बड़ा, समृद्ध और बंदरगाह वाला शहर था, जो अपनी भोग-विलास की संस्कृति के लिए भी जाना जाता था। पौलुस ने वहाँ डेढ़ वर्ष सेवकाई की थी (प्रेरितों 18)। उसके जाने के बाद कलीसिया में एक के बाद एक समस्याएँ उठ खड़ी हुईं।
इस पत्र की शुरुआत भी एक खबर से हुई। "क्लोई के घराने के लोगों" ने पौलुस को बताया कि तुम्हारे बीच झगड़े हैं (1:11)। साथ ही कलीसिया ने कुछ प्रश्न भी लिखकर भेजे थे (7:1)।
घरेलू कलीसिया के लिए यह पत्र खास है, क्योंकि इसमें यह बात साफ लिखी है: "अक्विला और प्रिस्का अपने घर की कलीसिया समेत तुम्हें प्रभु में बहुत नमस्कार कहते हैं" (16:19)। स्तिफनास का पूरा घराना भी सेवा में लगा हुआ था (16:15)। यानी यह पत्र घरों में मिलने वाली कलीसिया को ही लिखा गया है।
पिछले पत्रों ने हमें आशा और सुसमाचार की नींव दी थी। यह पत्र बताता है कि एक असली, अधूरी और संघर्ष करती कलीसिया साथ कैसे जिए।
2. इस चौथे पत्र का मुख्य संदेश क्या है?
इस पत्र का एक ही प्रश्न है - भिन्नताओं, कमज़ोरियों और गड़बड़ियों से भरी कलीसिया मसीह की एक देह कैसे बने?
पौलुस इसका उत्तर 4 भागों में देता है:
अ) एकता - मसीह पर केन्द्रित रहो (अध्याय 1-4)
कुरिन्थुस के लोग कह रहे थे, "मैं पौलुस का, मैं अपुल्लोस का, मैं कैफा का" (1:12)। पौलुस पूछता है: "क्या मसीह बँट गया?" (1:13)। वह विनती करता है कि तुम में फूट न हो, तुम एक मन और एक विचार में मिले रहो (1:10)।
इसका इलाज है क्रूस का वचन। वह संसार की दृष्टि में मूर्खता दिखता है, पर बचाए जाने वालों के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य है (1:18)। परमेश्वर ने जगत के मूर्खों और निर्बलों को इसलिए चुना कि कोई मनुष्य उसके सामने घमण्ड न कर सके (1:27-29)।
फिर वह सेवकाई की सही तस्वीर देता है: "मैंने लगाया, अपुल्लोस ने सींचा, पर परमेश्वर ने बढ़ाया" (3:6)। हम सब परमेश्वर के सहकर्मी हैं, और नींव केवल एक है: यीशु मसीह (3:11)। अगुवों को मसीह के सेवक और परमेश्वर के भेदों के भण्डारी समझना चाहिए, जिनसे विश्वासयोग्यता माँगी जाती है (4:1-2)।
तुम्हारे घर के लिए: घर की संगति में "मुझे यह अगुवा पसंद है", "मुझे वह शैली पसंद है" की जगह "मसीह हमारा केंद्र है" बोलो। जो व्यक्ति सबसे अच्छा बोलता है, उससे नहीं, जो क्रूस पर मरा उससे जुड़ो।
ब) पवित्रता - देह मन्दिर है, पाप को हल्का मत लो (अध्याय 5-7)
कलीसिया एक खुले पाप को भी सह रही थी, और उलटे घमण्ड कर रही थी (5:1-2)। पौलुस कहता है: "थोड़ा-सा खमीर सारे गूँधे हुए आटे को खमीर कर देता है" (5:6)। पाप को छिपाना या टालना पूरी संगति को बिगाड़ता है। अनुशासन का उद्देश्य उसे लौटा लाना और संगति को शुद्ध रखना है।
फिर एक बड़ी सच्चाई: "क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारी देह पवित्र आत्मा का मन्दिर है, जो तुम में बसा है? तुम अपने नहीं हो, क्योंकि दाम देकर मोल लिये गए हो; इसलिये अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो" (6:19-20)। पवित्रता एक बोझ नहीं, इस बात की पहचान है कि हम किसके हैं।
विवाह, अकेले रहने और परिवार पर भी पौलुस व्यावहारिक निर्देश देता है (अध्याय 7)। हर एक अपनी बुलाहट में परमेश्वर के सामने बना रहे (7:17, 24)।
तुम्हारे घर के लिए: घर की कलीसिया में सब एक-दूसरे को जानते हैं, इसलिए पाप को छिपाना भी आसान है और उसे प्रेम से सुधारना भी। अपने-अपने घर को मन्दिर की तरह देखो, जहाँ पवित्र आत्मा का वास है।
स) संगति - एक देह, अनेक अंग, और प्रेम की राह (अध्याय 8-14)
अध्याय 8-10: मूरतों को चढ़ाए गए भोजन पर सवाल उठा था। पौलुस का सिद्धांत सरल है: "ज्ञान घमण्ड उत्पन्न करता है, पर प्रेम उन्नति करता है" (8:1)। अपनी स्वतंत्रता का इतना उपयोग मत करो कि किसी निर्बल विश्वासी को ठोकर लगे। और सब कुछ इसलिए करो कि "चाहे खाओ, चाहे पियो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो" (10:31)।
अध्याय 11: प्रभु भोज। उस समय यह सामान्यतः घरों में साझा भोजन के साथ मनाया जाता था। कुरिन्थुस में कुछ अमीर पहले खा लेते और गरीब भूखे रह जाते (11:20-22)। पौलुस कहता है: यह प्रभु की मेज़ नहीं रही। प्रभु ने रोटी तोड़कर कहा, "यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये है" (11:24)। इसलिए "एक-दूसरे की प्रतीक्षा करो" (11:33)।
अध्याय 12: आत्मिक वरदान। "वरदान तो अनेक हैं, पर आत्मा एक ही है" (12:4)। और "हर एक को आत्मा का प्रकाश सब के लाभ के लिये दिया जाता है" (12:7)। यानी वरदान अपनी शान के लिए नहीं, दूसरों की सेवा के लिए मिलते हैं। देह में आँख हाथ से नहीं कह सकती कि मुझे तेरी ज़रूरत नहीं (12:21), और "यदि एक अंग दुःख पाता है, तो सब अंग उसके साथ दुःख पाते हैं" (12:26)।
अध्याय 13: प्रेम का मार्ग। सब वरदानों से उत्तम मार्ग यह है कि प्रेम धीरजवन्त है, कृपाल है, डाह नहीं करता, घमण्ड नहीं करता, सब बातें सह लेता है (13:4-7)। "अब विश्वास, आशा, प्रेम ये तीनों स्थाई हैं, पर इन में सब से बड़ा प्रेम है" (13:13)। यह पद विवाह के लिए नहीं, आपस में झगड़ती कलीसिया के लिए लिखा गया था।
अध्याय 14: जब तुम इकट्ठे होते हो, "हर एक के पास भजन, शिक्षा, प्रकाश, अन्य भाषा या अर्थ होता है; सब कुछ उन्नति के लिये हो" (14:26)। यह घरेलू सभा की सबसे सुन्दर तस्वीर है, जहाँ एक व्यक्ति नहीं, सब देते हैं। और "सब कुछ शालीनता और क्रम से हो" (14:40)।
तुम्हारे घर के लिए: अपनी सभा में देखो कि क्या हर व्यक्ति के लिए जगह है। बच्चा, बुज़ुर्ग, नया विश्वासी, स्त्री-पुरुष सब के पास कुछ देने को है। और जो निर्बल है, उसे ठोकर न लगे।
द) आशा - मसीह जी उठा है (अध्याय 15-16)
पौलुस सुसमाचार का सार दोहराता है: मसीह पवित्र शास्त्र के अनुसार हमारे पापों के लिये मरा, गाड़ा गया, और तीसरे दिन जी उठा (15:3-4)। और उसके जी उठने के बाद वह सैकड़ों को दिखाई दिया।
"यदि मसीह नहीं जी उठा, तो तुम्हारा विश्वास व्यर्थ है" (15:17)। पर वह जी उठा है, और सोए हुओं में पहला फल है (15:20)। इसलिए मृत्यु भी अंतिम शब्द नहीं है, और हमारा परिश्रम व्यर्थ नहीं।
अंत में एक साफ आदेश: "जागते रहो, विश्वास में स्थिर रहो, पुरुषार्थ करो, बलवन्त हो। तुम्हारे सब काम प्रेम से हों" (16:13-14)। और पत्र का अन्तिम शब्द है "मारानाथा", यानी हमारा प्रभु आने वाला है (16:22)।
तुम्हारे घर के लिए: जो कुछ हम घर में करते हैं, सेवा, संगति, प्रार्थना, वह प्रभु में व्यर्थ नहीं है। इसलिए "दृढ़ और अटल रहो, और प्रभु के काम में सर्वदा बढ़ते जाओ" (15:58)।
3. तुम्हारे घर के लिए 3 काम
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मसीह पर केन्द्रित रहो, फूट से बचो (1:10, 3:11) - घर में किसी की तुलना या पक्ष लेने की बात आए, तो याद करो: "क्या मसीह बँट गया?" हर मतभेद को सुलझाने से पहले क्रूस की ओर देखो।
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हर सदस्य का योगदान लाओ (12:7, 14:26) - अगली पारिवारिक सभा में हर एक व्यक्ति कुछ लाए: एक भजन, एक वचन, एक गवाही या एक प्रार्थना। छोटे बच्चे भी सहभागी हों। किसी को बाहर बैठा दर्शक मत रहने दो।
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सब कुछ प्रेम से करो (13:4-7, 16:14) - एक हफ्ते तक 1 कुरिन्थियों 13 के गुणों में से एक पर ध्यान दो, जैसे धीरज या कृपा, और घर में उसका अभ्यास करो। जहाँ प्रेम नहीं, वहाँ बड़े से बड़ा वरदान भी खोखला है।
आज की प्रार्थना:
"हे पिता, हमारे घर को अपने पुत्र की देह बना। हमारे बीच की फूट, घमण्ड और तुलना को मिटा। हर एक को अपना वरदान दे और उसे सब के लाभ के लिए उपयोग करना सिखा। हमारे सब काम प्रेम से हों, और हमें अपने जी उठे पुत्र की आशा में दृढ़ रख। आमीन।"
आज की घोषणा:
"मेरा घर मसीह की देह का एक अंग है! हम में फूट नहीं, एक मन है! हर एक के पास कुछ देने को है, और हम सब कुछ प्रेम से करते हैं! मसीह जी उठा है, इसलिए प्रभु में हमारा परिश्रम व्यर्थ नहीं है!" (12:27, 15:58)
आज का कार्य:
आज परिवार के साथ बैठकर 1 कुरिन्थियों 12:12-27 और अध्याय 13 पढ़ें। हर एक व्यक्ति बताए कि "मुझे परमेश्वर ने कौन-सा उपहार या क्षमता दी है जिससे मैं इस घर की सेवा कर सकता हूँ?" फिर हर सदस्य किसी एक की उस खूबी के लिए उसे खुलकर धन्यवाद दे।
"प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह तुम पर होता रहे। मेरा प्रेम मसीह यीशु में तुम सब के साथ रहे।" (16:23-24,
शालोम,

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