पौलुस का पहला पत्र - 1 थिस्सलुनीकियों में,
मुख्य वचन:
"हम अपने परमेश्वर और पिता के सामने तुम्हारे विश्वास के काम, प्रेम के परिश्रम और आशा के धीरज को लगातार स्मरण करते हैं।" - 1 थिस्सलुनीकियों 1:3,
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1. पौलुस का पहला पत्र कौन सा है?
पौलुस का पहला पत्र है - 1 थिस्सलुनीकियों का पत्र। इसे लगभग ई. 50-51 में कुरिन्थुस से लिखा गया माना जाता है।
यह सबसे विशेष है क्योंकि इसे पौलुस ने ऐसी कलीसिया को लिखा जिसे उसने बहुत थोड़े समय पहले शुरू किया था। विरोध के कारण उसे अचानक शहर छोड़ना पड़ा था।
थिस्सलुनीके मकिदुनिया का बड़ा व्यापारिक शहर था। पौलुस की टोली वहाँ यासोन के घर ठहरी थी, और भीड़ ने उसी घर पर हमला किया (प्रेरितों 17:5-7)। उस समय कलीसिया के लिए अलग भवन नहीं होते थे, इसलिए विश्वासी घरों में ही मिलते थे। यानी वहाँ घरेलू कलीसिया थी: न भवन, न अनुभवी अगुवा, और ऊपर से सताव।
पौलुस को चिंता थी कि इतनी नई कलीसिया कहीं टूट न जाए। उसने तीमुथियुस को भेजा। जब वह अच्छी खबर लाया कि वे विश्वास और प्रेम में दृढ़ हैं, तब पौलुस ने यह पत्र लिखा (3:6)।
यह पत्र एक पिता की चिट्ठी है, जो अपने नए बच्चों को थामे रखने के लिए लिखी गई है।
2. इस पहले पत्र का मुख्य संदेश क्या है?
इस पत्र का एक ही प्रश्न है - सताव और कठिनाई के बीच नई कलीसिया कैसे टिकी रहे?
पौलुस इसका उत्तर 4 भागों में देता है:
अ) पहचान - तुम परमेश्वर की चुनी हुई, आदर्श कलीसिया हो (अध्याय 1)
पौलुस कहता है कि सुसमाचार तुम्हारे पास केवल शब्दों में नहीं, बल्कि सामर्थ्य, पवित्र आत्मा और पूरे निश्चय के साथ पहुँचा (1:5)। और तुमने बहुत क्लेश में भी पवित्र आत्मा के आनन्द के साथ वचन ग्रहण किया (1:6)। आत्मिक जीवन की पहचान यह है कि दुख में भी भीतर आनन्द रहे।
पद 3 में तीन बातें हैं, और तीनों में एक-एक गहरी बात छिपी है:
- विश्वास का काम - जो विश्वास सचमुच है, वह चुप नहीं बैठता
- प्रेम का परिश्रम - जो प्रेम थकने की हद तक मेहनत करता है
- आशा का धीरज - जो आशा दबाव में भी डटी रहती है
और पद 9-10 में सच्चे परिवर्तन की तीन गतियाँ हैं: मूरतों से फिरना, जीवते परमेश्वर की सेवा करना, और उसके पुत्र यीशु की प्रतीक्षा करना।
तुम्हारे घर के लिए: छोटा घर भी पूरे मोहल्ले के लिए गवाही बन सकता है। पर पहले अपने आप से पूछो: हमारे घर में कौन-सी मूरत (धन, फोन, चिंता, प्रतिष्ठा) परमेश्वर की जगह ले रही है?
ब) आधार - माँ और पिता जैसा प्रेम (अध्याय 2-3)
पौलुस का लक्ष्य लोगों को खुश करना नहीं, उस परमेश्वर को प्रसन्न करना था जो हमारे हृदयों को जाँचता है (2:4)। उसने माँ की तरह कोमलता से सम्भाला (2:7) और पिता की तरह समझाया, ढाढ़स बँधाया और सही राह पर चलने का आग्रह किया (2:11-12)। सेवकाई का मतलब वचन बाँटना ही नहीं, अपना जीवन बाँटना है (2:8)।
और जब लोगों ने वचन को मनुष्य का नहीं, परमेश्वर का वचन जानकर ग्रहण किया, तब वही वचन विश्वास करने वालों में कार्य करता रहा (2:13)। वचन सुनने से ज़्यादा भीतर काम करने देने की चीज़ है।
क्लेश के बारे में पौलुस ने पहले ही बता दिया था कि दुख आएगा (3:3-4)। दुख का आना अनहोना नहीं है। और उसका हृदय देखिए: "अब यदि तुम प्रभु में स्थिर रहो, तो हम जीवित हैं" (3:8)। सच्चे अगुवा का जीवन अपने लोगों की स्थिरता में बसता है।
तुम्हारे घर के लिए: घर के अगुवा माता-पिता हैं। बच्चों को माँ की कोमलता भी चाहिए और पिता की दृढ़ता भी। सिर्फ आदेश देने से नहीं, अपना उदाहरण देने से घर बनता है।
स) जीवन - पवित्रता और शांत मेहनत (अध्याय 4:1-12)
"परमेश्वर की इच्छा यह है कि तुम पवित्र बनो।" (4:3) पवित्रता कोई बोझ नहीं, बुलाहट है: "परमेश्वर ने हमें अशुद्धता के लिये नहीं, पर पवित्र होने के लिये बुलाया है।" (4:7)
भाईचारे का प्रेम उन्हें परमेश्वर से ही सिखाया गया था (4:9)। फिर भी पौलुस कहता है कि इसमें और बढ़ते जाओ। प्रेम में कोई कभी "काफी" पर नहीं पहुँचता।
फिर वह एक अनोखी बात कहता है: शान्त जीवन बिताने की लालसा रखो, अपना काम करो और अपने हाथों से मेहनत करो (4:11)। दुनिया बड़ा नाम चाहती है, पर पौलुस के लिए शांत, ईमानदार और मेहनती जीवन एक ऊँचा लक्ष्य है। इसी से बाहर के लोग मसीह की ओर खिंचते हैं (4:12)।
तुम्हारे घर के लिए: सोमवार का जीवन ही रविवार की सभा की सच्ची गवाही है। घर की ईमानदारी, मेहनत और शांति ही सबसे बड़ा प्रचार है।
द) आशा - प्रभु लौट रहा है (अध्याय 4:13 - 5:28)
"आशा रहित लोगों की तरह शोक मत करो" (4:13)। पौलुस दुख या आँसू से मना नहीं करता, वह निराशा से मना करता है। क्योंकि यीशु मरा और जी उठा, इसलिए मसीह में सोए हुए हमारे अपने भी उसके साथ लौटेंगे (4:14)।
इसलिए हमें अंधकार में पड़े नहीं रहना है। हम ज्योति की सन्तान हैं (5:5), जागते और सचेत रहें, विश्वास और प्रेम की झिलम और उद्धार की आशा का टोप पहने हुए (5:8)।
पत्र का सबसे गहरा प्रार्थना-वचन यह है: "शान्ति का परमेश्वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे, और तुम्हारी आत्मा, प्राण और देह पूरी तरह निर्दोष सुरक्षित रहें।" (5:23) और फिर भरोसा: "जो तुम्हें बुलाता है, वह विश्वासयोग्य है, वही यह सब पूरा भी करेगा।" (5:24) यानी पवित्रता हमारी ताकत से नहीं, उसकी विश्वासयोग्यता से पूरी होती है।
तुम्हारे घर के लिए: हमारे घर की नींव किसी भवन पर नहीं, लौटने वाले प्रभु की आशा पर है। इसलिए हम दुख में भी निराश नहीं होते।
3. तुम्हारे घर के लिए 3 काम
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वचन को परमेश्वर का वचन मानकर सुनो (2:13) - रोज़ परिवार के साथ थोड़ा वचन पढ़ो। पढ़ने के बाद सब से पूछो: "यह वचन हम से क्या करवाना चाहता है?" वचन को सिर्फ जानकारी नहीं, आज्ञा और वादा मानकर ग्रहण करो।
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एक-दूसरे को शान्ति दो और उन्नति करो (5:11, 14) - घर में हर एक व्यक्ति दिन में कम से कम एक बार किसी को प्रोत्साहन का शब्द कहे। जो निर्बल है उसे सम्भालो, जो हारा हुआ है उसे हिम्मत दो, और सब के साथ धीरज रखो।
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सदा आनन्दित रहो, निरन्तर प्रार्थना करो, हर बात में धन्यवाद दो (5:16-18) - "क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है।" धन्यवाद परिस्थिति के लिए नहीं, हर परिस्थिति में देना है। जहाँ धन्यवाद है, वहाँ शिकायत की जगह नहीं रहती। और आत्मा को न बुझाओ (5:19): प्रार्थना और आराधना में पवित्र आत्मा के लिए जगह छोड़ो।
आज की प्रार्थना:
"हे पिता, हमारे घर को थिस्सलुनीके की कलीसिया की तरह विश्वास, प्रेम और आशा में मज़बूत कर। जहाँ हमारे घर में कोई मूरत जगह ले चुकी है, उससे हमें फेर। हमारे बीच अपने वचन को काम करने दे, हमें एक-दूसरे को थामे रखना सिखा, और अपने पुत्र के लौटने की आशा में हमें जागता रख। हमें पूरी रीति से पवित्र कर, क्योंकि तू विश्वासयोग्य है। आमीन।"
आज की घोषणा:
"मेरा घर छोटा है, पर परमेश्वर की कलीसिया है! हमारा विश्वास काम करता है, हमारा प्रेम परिश्रम करता है, हमारी आशा धीरज धरती है! हम अंधकार के नहीं, ज्योति की सन्तान हैं! जिसने हमें बुलाया है वह विश्वासयोग्य है, वही यह सब पूरा भी करेगा!" (5:24)
आज का कार्य:
आज परिवार के साथ बैठकर 1 थिस्सलुनीकियों 5:11-24 पढ़ें। फिर हर एक व्यक्ति अपनी गवाही दे - "मैं किस चीज़ से फिरकर परमेश्वर की ओर आया?" इसके बाद हर सदस्य किसी दूसरे के लिए प्रोत्साहन का एक वाक्य कहे, और सब मिलकर तीन बातों के लिए परमेश्वर को धन्यवाद दें।
शालोम,
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