कलीसिया वृद्धि की गति बढ़ाने वाले चालक

  1. हर जातियों में शिष्य बनाने के दर्शन को तथा प्रति विश्वासी को उसके उत्तराधिकार को प्राप्त करना आवश्यक है । (प्रेरितों के काम 26:17-18)
  2. प्रेरिताई शिक्षा, भावपूर्ण प्रार्थना, आश्चर्य काम, भौतिक आशीषों को बाँटना, घर-घर रोटी तोड़ना । (प्रेरितों के काम 2:42-47)
  3. दो-दो करके जाना, बड़ी मछली पकड़ना, घरेलू कलीसिया शान्ति के पुत्र के यहाँ स्थापित करना, पारस्परिक वार्तालाप तथा शिष्य बनाने वाली घरेलू कलीसिया । (लूका 10:1-9; 1 कुरिन्थियों 14:26)
  4. जहाँ प्रार्थना यात्रा, आत्मिक युद्ध, बलवंत को बाँधना और उसकी सम्पत्ति (आत्माओं) को लूटना । (1 तिमुथियुस 2:8; मत्ती 12:29)
  5. एक नहीं परन्तु अनेक अगुवे जो मात्र ज्ञान पर नहीं, परन्तु आज्ञाकारिता पर आधारित हैं । उन अवरोधकों को पहचानें जो विकास के विरुद्ध हैं और उन्हें हटायें ।
  6. प्रत्येक विश्वासी (पुरुष एवं स्त्री) का सामर्थीकरण एवं राजकीय याजकीकरण करना, जब तक कि साधारण सदस्य खत्म न हो जाये ।
  7. निरन्तर शोध करने की संस्कृति, नई रणनीति जो विस्फोटक हो, जो गतिवान हो, इन्हें प्रोत्साहित एवं पुरस्कृत करना, ताकि और अधिक गुणात्मक वृद्धि हो सके ।
  8. प्रतिदिन लोगों का पश्चाताप कराकर जल संस्कार करके जीवित बलिदान चढ़ायें । (इब्रानियों 3:13; रोमियों 12:1; 15:16; 1 कुरिन्थियों 14:24-25)
  9. जाति-भाषा-सांस्कृतिक बंध कार्य करने की शैली, जिसमें अनेक शिष्यों की पीढ़ी का ब्यौरा रखने की पद्धति। (प्रेरितों के काम 16:3-5; 2 तिमुथियुस 2:2; कुलुस्सियों 2:9)
  10. मूल्यांकन: शिष्य बनाने पर, घरेलू कलीसिया रोपण करने पर, मीरास पर कब्ज़ा और सामाजिक परिवर्तन के अनुसार । (यूहन्ना 15:8; प्रकाशित वाक्य 6:1; 16:5; प्रेरितों के काम 26:18)
  11. "आओ, बैठो और निष्क्रिय बनो" ऐसी प्रभावहीन कलीसिया से निकलो और एक ऐसी कलीसिया बनो जो शिष्यों को तैयार करती है, जिससे देह की बढ़ोत्तरी होती है । (इफिसियों 4:11-13)
  12. सलाह, परामर्श, मूल्यांकन हर पीढ़ी के शिष्यों का करो । पौलुस ने स्वयं तिमोथी को शिष्य बनाया, जिसने इम्फ्रास को शिष्य बनाया, जिसने अर्खिप्पुस को और अर्खिप्पुस ने नुम्फा को शिष्य बनाया । यही नुम्फा थी जो कुलुस्सि की कलीसिया की पास्टर थी । पौलुस ने अपने पत्र में सबको शुभकामनाएँ भेजीं । (2 तिमुथियुस 2:2; कुलुस्सियों 1:6; 4:12-16)

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