भूख, आज्ञाकारिता और नेतृत्व - तीन स्तम्भ - मत्ती 5:6 - भूखे ही अगुवे बनते हैं - Hunger Obedience Leadership Hindi
"यदि तुम आज्ञा मानकर मेरी सुनो, तो उस देश की उत्तम से उत्तम वस्तुएँ खाओगे" (यशायाह 1:19)
भूमिका: भूख केवल पेट की समस्या नहीं है। भूख हमें अधिकार से वंचित करती है, और जो भूखा होता है वह व्यवसायी या अगुवा नहीं, गुलाम बन जाता है। बाइबल में इसके उदाहरण भरे पड़े हैं। भाग 1: भूख हमें गुलामी की ओर ले जाती है।
1. मिस्र के लोग (उत्पत्ति 47:13-26)
अकाल में मिस्रवासियों ने पहले पैसा, फिर पशु, फिर ज़मीन और अंत में स्वयं को रोटी के बदले बेच दिया । उन्होंने कहा, "हमें और हमारी भूमि को भोजन के बदले मोल ले लो, हम फ़िरौन के दास होंगे" (47:19) । भूख ने अधिकार छीना और गुलामी दी।
2. याकूब का परिवार (उत्पत्ति 46:1-4; निर्गमन 1:8-14; 12:40)
भूख के कारण याकूब का परिवार मिस्र गया। यूसुफ के जीते जी वे सम्मान से रहे, परन्तु जब "यूसुफ को न जानने वाला नया राजा" उठा (निर्गमन 1:8), तब नेतृत्व का अधिकार चला गया और 430 वर्ष की गुलामी आई।
3. एसाव (उत्पत्ति 25:29-34)
एक कटोरा दाल के लिए एसाव ने जेठा होने का अधिकार बेच दिया। भूख ने उसकी विरासत छीन ली।
4. जंगल में इस्राएली (गिनती 11:4-6)
भूख लगने पर वे मिस्र की गुलामी का भोजन याद करके लौटना चाहने लगे। गुलामी की मानसिकता भूख से ही पनपती है।
भाग 2: कारण: अनाज्ञाकारिता (शत्रु की सामर्थ)
व्यवस्थाविवरण 28 दोनों रास्ते दिखाता है:
- आज्ञाकारिता: आशीष, भरे भण्डार, "तू सिर होगा, पूँछ नहीं" (28:1-14)
- अनाज्ञाकारिता: "तू भूख, प्यास और सब वस्तुओं की घटी में अपने शत्रुओं की सेवा करेगा" (28:47-48)
आज्ञाकारिता में:
- अपने घर की भूख को भगाओ, परिवार जोड़ो, कलीसिया रोपण करो।
- शासन चलाओ और शिष्य बनाओ। हर क्षेत्र में लीडरशिप तैयार करो।
- घर भूख और गुलामी की ओर जाता है। घर का बिखराव कलीसिया का बिखराव बन जाता है।
- हज़ारों वर्ष की गुलामी आती है, और नेतृत्व, अधिकार और सामर्थ शत्रु के हाथ में चली जाती है।
यूसुफ (उत्पत्ति 39–41)
उसने पोतीपर के घर, बन्दीगृह और फिर पूरे मिस्र में आज्ञाकारिता और ईमानदारी से सेवा की। फ़िरौन ने कहा, "परमेश्वर का आत्मा जिसमें है, उसके समान कौन है?" (41:38)। यूसुफ का नेतृत्व इसलिए आया ताकि उसका परिवार और राष्ट्र भूख से बचे (उत्पत्ति 45:5-7; 50:20)।
इसहाक (उत्पत्ति 26:1-12)
अकाल के समय परमेश्वर ने मिस्र जाने से रोका । इसहाक ने आज्ञा मानी, उसी देश में बोया और सौ गुना पाया।
सारपत की विधवा (1 राजा 17:8-16) - आज्ञा मानने से मुट्ठी भर आटा और थोड़ा तेल कभी नहीं घटा।
मन्ना (निर्गमन 16)
परमेश्वर ने रोज़ का भोजन दिया। आज्ञा मानने वालों को मिला, न मानने वालों का सड़ गया।
भाग 4: हम क्या करें?
1. हर व्यवसाय में खड़े हों: पेट भरे, मेन्टरशिप तैयार करें, गर्भ गृह खोले व्यवसाई बने ।
- लुदिया, कपड़े की व्यापारी। (प्रेरितों 16:14)
- प्रिस्किल्ला और अक्विला, तम्बू बनाने वाले। (प्रेरितों 18:3)
- "वही है जो तुझे धन प्राप्त करने की शक्ति देता है"। (व्यवस्थाविवरण 8:18)
- मूसा को मिस्र की सारी विद्या सिखाई गई। (प्रेरितों 7:22)
- दानिय्येल ने बाबुल की शिक्षा पाई पर परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य रहा। (दानिय्येल 1:4, 17-20)
- "जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ।" (मत्ती 28:19-20)
- यूसुफ (मिस्र), दानिय्येल (बाबुल), नहेमायाह (फारस), एस्तेर (रानी)
- "जब धर्मी वृद्धि पाते हैं तो प्रजा आनन्दित होती है"। (नीतिवचन 29:2)
- हर क्षेत्र में ऐसे लोग हों जिनके पास ईमानदारी और परमेश्वर का भय हो।
- "पहले परमेश्वर के राज्य और धर्म की खोज करो, तो ये सब वस्तुएँ तुम्हें मिल जाएँगी" । (मत्ती 6:25-33)
- "मेरा परमेश्वर अपने धन के अनुसार तुम्हारी हर घटी पूरी करेगा" । (फिलिप्पियों 4:19)
- भजन 37:25 और भजन 23
1. भूख केवल पेट की समस्या नहीं, अधिकार की समस्या है।
जो भूखा होता है, वह अपने अधिकार और निर्णय की स्वतंत्रता खो देता है। (उत्पत्ति 47:19; 25:34)।
2. आज्ञाकारिता से नेतृत्व आता है।
यूसुफ की आज्ञाकारिता से परमेश्वर ने उसे ऊँचा उठाया ताकि परिवार और देश भूख से बचे (उत्पत्ति 45:5-7)।
3. अनाज्ञाकारिता से बिखराव और गुलामी आती है।
व्यवस्थाविवरण 28:47-48 की चेतावनी साफ़ है। घर का बिखराव कलीसिया का बिखराव बन जाता है।
4. परमेश्वर पेट भरता है। - मन्ना, सारपत की विधवा का आटा और तेल, और इसहाक की सौ गुनी उपज यही सिखाती है (फिलिप्पियों 4:19।
5. नेतृत्व हर क्षेत्र में तैयार करना है।
व्यवसाय, शिक्षा और शासन, तीनों जगह ऐसे लोग चाहिए जो ईमानदारी और परमेश्वर के भय से खड़े हों और दूसरों को भी तैयार करें (मत्ती 28:19-20)।
कार्य करें: आज निर्णय लीजिए
"आज तुम किसकी सेवा करोगे, इसे चुन लो... परन्तु मैं और मेरा घराना तो यहोवा की सेवा करेंगे।" (यहोशू 24:15)
आज का निर्णय केवल सुनने का नहीं, कार्य आरंभ करने का है। आज ही ये कदम उठाइए:
- अपने घर की भूख मिटाने का कदम चुनिए। परिवार को जोड़िए, पारिवारिक प्रार्थना शुरू कीजिए, और आय का कोई स्रोत या कौशल बढ़ाने की योजना बनाइए।
- एक व्यक्ति को शिष्य या मेंटी चुनिए । किसी एक युवा या परिवार को चुनिए जिसे आप सिखाएँगे और नेतृत्व के लिए तैयार करेंगे।
- शिक्षा में निवेश कीजिए। अपने बच्चों और कलीसिया के बच्चों की शिक्षा और कौशल के लिए कोई ठोस पहल कीजिए।
- किसी भूखे का पेट भरिए। इस सप्ताह किसी एक जरूरतमंद को भोजन दीजिए और उसे सिखाइए कि परमेश्वर विश्वासयोग्य है।
- अपने क्षेत्र में ईमानदार नेतृत्व के लिए खड़े होइए। व्यवसाय, स्कूल या स्थानीय शासन में जहाँ आप हैं, वहाँ सेवा और ईमानदारी से प्रभाव बनाइए।
आज मैं यह निर्णय लेता/लेती हूँ कि:
- मैं अपने घर में ______________________________ करूँगा/करूँगी।
- मैं ______________________ को शिष्य/मेंटी बनाऊँगा/बनाऊँगी।
- मैं इस सप्ताह ______________________ का पेट भरूँगा/भरूँगी।
- मैं ______________________ क्षेत्र में नेतृत्व के लिए तैयार होऊँगा/होऊँगी।
प्रार्थना
हे प्रभु, हमें आज्ञाकारी बना, ताकि हमारे घर भूख और गुलामी से बचें और हम हर क्षेत्र में तेरे राज्य के लिए अगुवे बनें । हमारा पेट तू भरेगा, इस पर हमारा भरोसा बढ़ा। आमीन।
शालोम, प्रभु आपको निर्णय लेने में सहायता करें आशिष देवे।
आपको यह सन्देश कैसा लगा हमें पर्सनली हमें लिखें और सुझाव दीजिये,
प्रभु में सहभागी आपकी
महान आदेश और घरेलु कलीसिया
Shalom,

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें