सत्संग का जन्म, पतन और वापसी: क्यों आज घर की कलीसिया (House Church) में लौटना जरूरी है?
प्रिय भाई-बहनो, आज हम कलीसिया के इतिहास पर एक नज़र डालते हैं। एक सवाल मन में आता है: जो कलीसिया शुरू में इतनी तेज़ी से बढ़ी, वह आज इतनी धीमी क्यों लगती है?
शुरुआत कैसी थी?
पिन्तेकुस्त के दिन लगभग 3,000 लोगों ने जल दीक्षा ली, और सतसंग का आरंभ हुआ। उस समय न कोई बड़ा भवन था, न कोई वेतनभोगी पासबान, न संगीत के साज़, न कोई लिखित सुसमाचार। उनके पास न राजनीतिक ताक़त थी, न पैसा। फिर भी वे बहुत तेज़ी से बढ़े, क्योंकि उनके पास पवित्र आत्मा की सामर्थ थी।
वे घर-घर रोटी तोड़ते थे, यानी साथ मिलकर भोजन करते थे। वे वचन पर बात करते थे और शिष्य बनाने में लगे रहते थे। कलीसिया उनके घरों में जीती थी, उनके रिश्तों में बसती थी, और उनके जीवन में दिखती थी।
बदलाव कहाँ से आया?
समय के साथ बहुत-सी बातें जुड़ती गईं जो नए नियम में नहीं मिलतीं। धीरे-धीरे कलीसिया का स्वरूप बदल गया। इस बदलाव को एक-एक करके देखें तो कुछ बातें साफ़ दिखती हैं:
- परमेश्वर के परिवार की जगह एक रीति-रिवाज़ी संस्था (इफिसियों 2:19-20)।
- विश्वासियों के घरों की जगह धार्मिक इमारतें (प्रेरितों के काम 7:48-49)।
- राजपदधारी याजकों की जगह आम विश्वासी (1 पतरस 2:9) के बजाय सिर्फ़ कुछ लोग मंच पर।
- रोज़ की कलीसिया की जगह सिर्फ़ रविवार की सभा (प्रेरितों के काम 2:46-47)।
- स्वेच्छा से दान की जगह अनिवार्य दशमांश (2 कुरिन्थियों 9:6-7)।
- शिष्य बनाने वालों की जगह ऐसे सदस्य जिनका कोई फल नहीं (मत्ती 28:19)।
- वचन पर चलने वालों की जगह सिर्फ़ सुनने वाले (याकूब 1:22)।
प्रकाशितवाक्य 3:1 की चेतावनी भी गंभीर है: "मैं तुम्हारे कामों को जानता हूँ, तुम सोचते हो कि हम जीवित हैं, लेकिन तुम मृतक हो।" यह बात किसी को दोष देने के लिए नहीं, बल्कि अपने आप को परखने के लिए है।
घर की कलीसिया की ओर लौटना
सौ से ज़्यादा साल पहले मार्टिन लूथर ने भी घरों में इकट्ठा होने की बात कही थी। उनके अनुसार विश्वासी घरों में प्रार्थना करें, वचन पढ़ें, जल दीक्षा दें, प्रभु भोज लें और मसीही जीवन जिएँ। दान स्वेच्छा से हो, और सादगी से वचन, प्रार्थना और प्रेम की ओर ध्यान रहे।
आज हम उसी सादगी की ओर लौटने के लिए बुलाए गए हैं। घर की कलीसिया में कोई दिखावा नहीं चाहिए। ज़रूरत है एक साथ बैठने की, वचन खोलने की, एक-दूसरे का बोझ उठाने की और यीशु के लिए जीने की।
आज हम क्या करें?
अपने परिवार या कुछ मित्रों के साथ घर पर वचन पढ़ना शुरू करें।
एक-दूसरे के लिए नाम लेकर प्रार्थना करें।
ज़रूरतमंद की मदद स्वेच्छा से और खुशी से करें।
शिष्य बनाने की इच्छा को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ।
प्रभु हमें वह सादगी और वह जोश दे, जो शुरुआती कलीसिया में था।
शालोम,

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