प्रभु यीशु की 3 प्रमुख आज्ञाएँ: प्रेम करो, सेवा करो और चेले बनाओ - बाइबल अध्ययन
प्रिय भाई-बहनो, आज हम एक ऐसे सवाल पर बात करते हैं जो हर विश्वासी के मन में कभी न कभी आता है: परमेश्वर हमसे असल में क्या चाहता है?
एक धर्मगुरु ने यीशु से पूछा कि सबसे बड़ी आज्ञा कौन-सी है। यीशु ने जो जवाब दिया, वह आज भी उतना ही सीधा और गहरा है। उनके उत्तर में हमारे पूरे जीवन का रास्ता छिपा है।
पहली आज्ञा: परमेश्वर से प्रेम
लूका 10:27 में लिखा है कि हमें प्रभु अपने परमेश्वर से अपने पूरे मन, पूरे प्राण, पूरी शक्ति और पूरी बुद्धि के साथ प्रेम करना है। इसका मतलब है कि परमेश्वर से प्रेम सिर्फ़ रविवार की प्रार्थना तक सीमित नहीं है। यह हमारी सोच, हमारे समय, हमारी मेहनत और हमारे फ़ैसलों में झलकना चाहिए।
प्रेम में आज्ञाकारिता भी होती है। यूहन्ना 14:15 में यीशु कहते हैं, "यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं का पालन करोगे।" इसलिए हमारा परमेश्वर से रिश्ता बातों में नहीं, रोज़मर्रा के चुनावों में दिखता है।
दूसरी आज्ञा: पड़ोसी से प्रेम
यीशु ने दूसरी आज्ञा भी उतनी ही साफ़ दी: अपने पड़ोसी से प्रेम रखो। लेकिन उन्होंने "पड़ोसी" की परिभाषा बदल दी। उनके लिए पड़ोसी वह नहीं है जो हमारे बगल में रहता है, बल्कि वह है जो ज़रूरत में है।
लूका 10 की प्रसिद्ध कहानी इसे समझाती है। एक यहूदी व्यक्ति रास्ते में घायल पड़ा था। एक याजक और एक लेवी, जो धार्मिक लोग थे, उसे देखकर कतराकर चले गए। पर एक सामरी व्यक्ति रुका, उसकी मरहम-पट्टी की और उसकी देखभाल की। यीशु ने पूछा कि इन तीनों में से पड़ोसी कौन था। जवाब साफ़ था: जिसने दया दिखाई।
यह कहानी हमसे भी यही पूछती है। क्या हम धार्मिक होने के साथ-साथ दयालु भी हैं? क्या हम ज़रूरतमंद को देखकर रुकते हैं, या कतराकर चले जाते हैं?
अपने आप से प्रेम
यीशु ने यह भी कहा कि हमें अपने आप से प्रेम करना है। इसका मतलब घमंड नहीं, बल्कि अपनी सही पहचान को समझना है। आप जैसे भी हैं, परमेश्वर ने आपको अपने स्वरूप और समानता में बनाया है। उसने आपको अपनी संतान, अपना राजदूत और राजपदधारी याजक बनाया है।
इसका असर हमारे आत्म-सम्मान पर भी पड़ता है। जब हम जानते हैं कि परमेश्वर हमें अनमोल समझता है, तो हम खुद को कम आँकने की जगह उसकी दी हुई हैसियत के साथ काम कर सकते हैं।
शिष्यता की पहचान: आपस का प्रेम
यूहन्ना 13:34-35 में यीशु कहते हैं, "जैसा मैंने तुमसे प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक-दूसरे से प्रेम रखो। यदि आपस में प्रेम रखोगे, तो इसी से सब लोग जानेंगे कि तुम मेरे चेले हो।"
यानी दुनिया हमारे धर्म, हमारी बातों या हमारे प्रचार से ज़्यादा, हमारे आपसी प्रेम से पहचानेगी कि हम यीशु के शिष्य हैं। यह प्रेम सिर्फ़ अपने लोगों तक सीमित नहीं होना चाहिए। मत्ती 5:44-45 में यीशु सिखाते हैं कि अपने बैरियों से भी प्रेम रखो और अपने सताने वालों के लिए प्रार्थना करो। परमेश्वर भी भले और बुरे दोनों पर सूरज उदय करता है। यह प्रेम कठिन है, पर इसी से हम अपने स्वर्गीय पिता की संतान ठहरते हैं।
सेवा से पहले सामर्थ, फिर प्रचार
यीशु ने जब अपने शिष्यों को भेजा, तो पहले उन्हें दुष्टात्माओं को निकालने और बीमारों को चंगा करने का अधिकार दिया, और फिर प्रचार करने भेजा (लूका 9:1-2)। इससे पता चलता है कि सुसमाचार सिर्फ़ शब्दों से नहीं, परमेश्वर की सामर्थ और दया के कामों से भी फैलता है। जब लोग यीशु का प्रेम अपनी ज़िंदगी में देखते हैं, तो उनके लिए उसके वचन पर भरोसा करना आसान होता है।
मत्ती 4:19 में यीशु कहते हैं, "मेरे पीछे चलो, तो मैं तुम्हें मनुष्यों के मछुवारे बना दूँगा।" मछुवारा जाल डालता है, धैर्य रखता है और लोगों को किनारे तक लाता है। हमारा काम भी यही है: प्यार से, धैर्य से लोगों तक पहुँचना।
प्रभु का अंतिम और सबसे प्रमुख आदेश
मत्ती 28:19-20 में यीशु ने अपना अंतिम आदेश दिया: "तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ, उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो, और उन्हें वे सब बातें मानना सिखाओ जो मैंने तुम्हें आज्ञा दी हैं। और देखो, मैं जगत के अंत तक सदैव तुम्हारे संग हूँ।"
इस आदेश में तीन बातें हैं: चेला बनाना, बपतिस्मा देना और आज्ञाकारिता सिखाना। और सबसे बड़ा वादा यह है कि यीशु स्वयं हमारे साथ हैं। इस काम में हम अकेले नहीं हैं।
आज हम क्या करें?
यह आज्ञाएँ बड़ी लगती हैं, पर इनकी शुरुआत छोटे कदमों से होती है:
परमेश्वर से रोज़ का रिश्ता: हर दिन थोड़ा समय वचन पढ़ने और प्रार्थना में बिताएँ।
ज़रूरतमंद को पहचानें: आसपास किसी ऐसे व्यक्ति को खोजें जिसे सहायता, समय या प्रार्थना की ज़रूरत है, और रुककर उसकी मदद करें।
घर में प्रेम का अभ्यास: परिवार और साथियों के बीच धैर्य, क्षमा और सम्मान से पेश आएँ।
किसी एक व्यक्ति को शिष्यता की ओर ले चलें: किसी एक व्यक्ति के साथ वचन बाँटें और उसके लिए नाम लेकर प्रार्थना करें।
प्रभु हमें वह प्रेम दे जो दूसरों को छूता है, और वह सामर्थ दे जो हमें आज्ञाकारी बनाए रखे।
शालोम,

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