हर जातियों में शिष्य बनाने का दर्शन
परमेश्वर के राज्य का विस्तार और प्रत्येक विश्वासी का उत्तराधिकार
"मैं तुझे इसलिए भेजता हूँ कि तू उनकी आँखें खोले, जिससे वे अन्धकार से ज्योति की ओर और शैतान के अधिकार से परमेश्वर की ओर फिरें, कि वे मुझ पर विश्वास करने से पापों की क्षमा और पवित्र किए हुओं के साथ मीरास प्राप्त करें।"(प्रेरितों के काम 26:17–18)
प्रस्तावना
बाइबल का सबसे महान विषय केवल उद्धार नहीं, बल्कि परमेश्वर के राज्य का विस्तार है। उद्धार उस यात्रा का आरम्भ है, जिसका अंतिम उद्देश्य है - मनुष्य को परमेश्वर के स्वरूप में पुनर्स्थापित करना, उसे उसका आत्मिक उत्तराधिकार देना, और उसे ऐसा शिष्य बनाना जो आगे और शिष्य तैयार करे। यही कारण है कि यीशु मसीह ने अपनी पृथ्वी की सेवकाई के अन्त में अपने शिष्यों को कोई धार्मिक संस्था स्थापित करने का आदेश नहीं दिया, बल्कि स्पष्ट आज्ञा दी -
"इसलिए तुम जाकर सब जातियों को चेला बनाओ..." (मत्ती 28:19–20)
यह केवल ग्यारह प्रेरितों के लिए नहीं था; यह प्रत्येक पीढ़ी के प्रत्येक विश्वासी के लिए परमेश्वर की आज्ञा है। जो स्वयं मसीह का शिष्य है, वही दूसरों को भी शिष्य बनाने के लिए बुलाया गया है। इसलिए शिष्य बनाना कुछ चुने हुए प्रचारकों या मिशनरियों का कार्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण कलीसिया की पहचान है।
प्रेरित पौलुस ने जब अपने बुलाहट का वर्णन किया, तब उन्होंने केवल प्रचार करने की बात नहीं कही। उन्होंने कहा कि प्रभु ने उन्हें इसलिए भेजा कि लोगों की आँखें खुलें, वे अन्धकार से ज्योति की ओर आएँ, शैतान के अधिकार से परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करें, पापों की क्षमा पाएँ और पवित्र किए हुओं के साथ अपनी मीरास प्राप्त करें (प्रेरितों के काम 26:17–18)। इसका अर्थ है कि प्रत्येक विश्वासी केवल स्वर्ग जाने के लिए नहीं बुलाया गया, बल्कि परमेश्वर के राज्य में अपने उत्तराधिकार को ग्रहण करने और दूसरों को भी उसमें सहभागी बनाने के लिए बुलाया गया है।
यह उत्तराधिकार केवल भविष्य का स्वर्ग नहीं है। इसमें पवित्र आत्मा की सामर्थ्य, परमेश्वर की उपस्थिति, आत्मिक अधिकार, सेवकाई का अभिषेक, आत्मिक वरदान, परमेश्वर के वचन की समझ, और उसके राज्य के विस्तार में सहभागी होने का विशेषाधिकार सम्मिलित है। इसी कारण पौलुस इफिसियों की कलीसिया के लिए प्रार्थना करते हैं कि उनकी आत्मिक आँखें खुल जाएँ ताकि वे जान सकें कि परमेश्वर ने अपने पवित्र लोगों के लिए कैसी महिमामय मीरास तैयार की है (इफिसियों 1:17–19)।
दुर्भाग्य से आज बहुत-सी कलीसियाएँ विश्वासियों को उद्धार तक तो ले आती हैं, परन्तु उन्हें उनके उत्तराधिकार तक नहीं पहुँचातीं। लोग वर्षों तक कलीसिया में रहते हैं, परन्तु वे न तो आत्मिक रूप से परिपक्व बनते हैं, न सेवकाई में बढ़ते हैं और न ही दूसरों को मसीह का शिष्य बनाते हैं। परिणामस्वरूप कलीसिया बढ़ती हुई प्रतीत तो होती है, परन्तु वास्तव में वह गुणात्मक रूप से दुर्बल होती जाती है।
नए नियम की कलीसिया ऐसी नहीं थी। वहाँ प्रत्येक विश्वासी एक सेवक था, प्रत्येक सेवक एक शिष्य था, और प्रत्येक शिष्य किसी न किसी दूसरे व्यक्ति को तैयार कर रहा था। यही कारण था कि थोड़े ही वर्षों में सुसमाचार यरूशलेम से यहूदिया, सामरिया और फिर रोमी साम्राज्य के दूर-दूर के नगरों तक पहुँच गया (प्रेरितों के काम 1:8; कुलुस्सियों 1:6, 23)। यह वृद्धि केवल प्रचार के कारण नहीं हुई; यह शिष्य बनाने की प्रक्रिया के कारण हुई।
परमेश्वर की योजना आज भी नहीं बदली है। वह ऐसी कलीसिया चाहता है जो केवल सभाएँ आयोजित न करे, बल्कि शिष्यों को तैयार करे; केवल भवनों का निर्माण न करे, बल्कि ऐसे लोगों का निर्माण करे जो उसके राज्य के प्रतिनिधि बनकर प्रत्येक जाति, भाषा और संस्कृति में जाकर उसके राज्य का विस्तार करें। यही महान आदेश का हृदय है, यही प्रेरिताई सेवकाई का केन्द्र है, और यही वह दर्शन है जो आने वाली पीढ़ियों तक सुसमाचार को पहुँचाता है।
प्रेरिताई कलीसिया का जीवन: शिष्य बनाने का दिव्य नमूना
"वे प्रेरितों की शिक्षा में, संगति रखने में, रोटी तोड़ने में और प्रार्थना करने में लौलीन रहे। सब लोगों पर भय छा गया, और बहुत से आश्चर्यकर्म और चिन्ह प्रेरितों के द्वारा प्रगट होते थे। सब विश्वासी एक साथ रहते थे और उनकी सब वस्तुएँ साझे की थीं… और वे प्रतिदिन एक मन होकर मन्दिर में उपस्थित होते, और घर-घर रोटी तोड़ते थे… और प्रभु प्रतिदिन उद्धार पाने वालों को उनकी मण्डली में मिला देता था।"
(प्रेरितों के काम 2:42–47)
कलीसिया केवल एक सभा नहीं, बल्कि एक जीवन-शैली है
जब हम नए नियम की कलीसिया का अध्ययन करते हैं, तो हम पाते हैं कि उसकी सबसे बड़ी सामर्थ्य उसके भवन, संगठन या कार्यक्रम नहीं थे। उसकी शक्ति पवित्र आत्मा की उपस्थिति और शिष्य बनाने वाली जीवन-शैली थी।
आज बहुत-सी कलीसियाओं में उत्कृष्ट भवन, आधुनिक तकनीक, प्रभावशाली संगीत और सुव्यवस्थित कार्यक्रम हैं; फिर भी वे प्रेरितों के काम जैसी आत्मिक वृद्धि का अनुभव नहीं करतीं। इसका कारण यह नहीं कि परमेश्वर बदल गया है, बल्कि यह है कि कई स्थानों पर कलीसिया का केन्द्र शिष्य बनाना नहीं, बल्कि कार्यक्रम चलाना बन गया है।
प्रेरितों के काम 2 हमें ऐसी कलीसिया का चित्र दिखाता है जो केवल सप्ताह में एक दिन नहीं जीती थी; वह प्रतिदिन मसीह के जीवन को प्रकट करती थी। उसका प्रत्येक सदस्य सक्रिय था। प्रत्येक घर सेवा का केन्द्र था। प्रत्येक विश्वासी सुसमाचार का गवाह था। प्रत्येक अगुवा शिष्यों को तैयार कर रहा था। परिणामस्वरूप परमेश्वर स्वयं प्रतिदिन नए लोगों को उस संगति में जोड़ता था।
यहाँ पाँच ऐसे स्तंभ दिखाई देते हैं जिन पर प्रेरिताई कलीसिया खड़ी थी।
1. प्रेरितों की शिक्षा - सत्य पर आधारित शिष्य निर्माण
सबसे पहले लिखा है — "वे प्रेरितों की शिक्षा में लौलीन रहे।" (प्रेरितों के काम 2:42)
ध्यान दीजिए कि उन्होंने केवल प्रेरितों के उपदेश सुने नहीं, बल्कि उनकी शिक्षा में स्थिर बने रहे। इसका अर्थ था कि वे वचन को अपने जीवन में उतारते थे।
यीशु ने अपने महान आदेश में भी यही कहा था —
"उन्हें यह सिखाओ कि जो कुछ मैंने तुम्हें आज्ञा दी है, उसका पालन करें।" (मत्ती 28:20)
उन्होंने यह नहीं कहा — "उन्हें केवल ज्ञान दो।"
उन्होंने कहा — "उन्हें आज्ञाकारिता सिखाओ।"
यही सच्चे शिष्य निर्माण का केन्द्र है।
आज कलीसिया में बाइबल का ज्ञान पहले की तुलना में अधिक उपलब्ध है। पुस्तकों, सेमिनारों, वीडियो और ऑनलाइन शिक्षाओं की कोई कमी नहीं है। फिर भी प्रश्न यह है —
क्या लोग केवल जानकारी प्राप्त कर रहे हैं, या उनका जीवन भी बदल रहा है?
यीशु ने कहा —
"यदि तुम मेरी बातों को सुनकर उन पर चलते हो, तो तुम उस बुद्धिमान मनुष्य के समान हो जिसने अपना घर चट्टान पर बनाया।" (मत्ती 7:24–25)
सच्चा शिष्य वही है जो वचन को सुनता ही नहीं, बल्कि उसके अनुसार जीवन भी जीता है।
2. भावपूर्ण प्रार्थना - आत्मिक सामर्थ्य का स्रोत
दूसरा स्तंभ था - "वे प्रार्थना करने में लगे रहते थे।" (प्रेरितों के काम 2:42)
प्रेरितों की कलीसिया की शक्ति उनकी योजनाओं में नहीं, बल्कि उनकी प्रार्थनाओं में थी।
जब पतरस बन्दीगृह में था —
"कलीसिया उसके लिए परमेश्वर से लगातार प्रार्थना कर रही थी।" (प्रेरितों के काम 12:5)
जब सेवकाई के लिए अगुवों को भेजना था —
"उन्होंने उपवास और प्रार्थना की, और फिर बरनबास और शाऊल को भेजा।"
(प्रेरितों के काम 13:2–3)
जब किसी निर्णय की आवश्यकता होती थी, तब वे पहले परमेश्वर की इच्छा खोजते थे।
यही कारण है कि उनके निर्णयों में स्वर्ग का समर्थन था।
आज यदि कलीसिया को फिर से प्रेरिताई सामर्थ्य चाहिए, तो उसे फिर से घुटनों पर लौटना होगा।
3. आश्चर्यकर्म और चिन्ह - राज्य की पुष्टि
प्रेरितों के काम में लिखा है —
"बहुत से आश्चर्यकर्म और चिन्ह प्रेरितों के द्वारा होते थे।" (प्रेरितों के काम 2:43)
आश्चर्यकर्म प्रचार का विकल्प नहीं थे।
वे सुसमाचार की पुष्टि थे।
मरकुस लिखता है — "प्रभु उनके साथ होकर वचन की पुष्टि उन चिन्हों के द्वारा करता था जो उसके पीछे-पीछे होते थे।" (मरकुस 16:20)
यीशु ने कहा —
"जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह भी वे काम करेगा जो मैं करता हूँ।" (यूहन्ना 14:12)
जहाँ परमेश्वर का राज्य प्रकट होता है, वहाँ अन्धकार पीछे हटता है, बीमार चंगे होते हैं, बन्धन टूटते हैं और जीवन बदलते हैं।
परन्तु हमें यह भी समझना चाहिए कि चिन्ह स्वयं लक्ष्य नहीं हैं।
शिष्य बनाना लक्ष्य है।
चिन्ह और आश्चर्यकर्म उस लक्ष्य की पुष्टि करते हैं।
4. उदारता और सहभागिता - प्रेम का जीवित प्रमाण
प्रेरितों के काम में लिखा है —
"सब विश्वासी एक साथ रहते थे और उनकी सब वस्तुएँ साझे की थीं।"
(प्रेरितों के काम 2:44–45)
इसका अर्थ यह नहीं कि निजी सम्पत्ति समाप्त कर दी गई थी।
इसका अर्थ था कि कोई भी विश्वासी दूसरे की आवश्यकता के प्रति उदासीन नहीं था।
जब किसी भाई या बहन को आवश्यकता होती, तो दूसरे आनन्द से उसकी सहायता करते।
यही प्रेम संसार के लिए सबसे बड़ा साक्ष्य बन गया।
यीशु ने पहले ही कहा था —
"यदि तुम आपस में प्रेम रखोगे, तो इसी से सब जानेंगे कि तुम मेरे चेले हो।" (यूहन्ना 13:35)
जहाँ केवल उपदेश है, पर प्रेम नहीं, वहाँ शिष्य निर्माण अधूरा है।
जहाँ प्रेम, सेवा और त्याग है, वहाँ लोग मसीह को जीवित देखते हैं।
5. घर-घर रोटी तोड़ना - शिष्य निर्माण का सबसे प्रभावी केन्द्र
प्रेरितों के काम में लिखा है —
"वे घर-घर रोटी तोड़ते थे।" (प्रेरितों के काम 2:46)
यह केवल भोजन करना नहीं था।
यह था —
- संगति,
- शिक्षा,
- प्रार्थना,
- प्रभु भोज,
- आत्मिक उत्तरदायित्व,
- और नए विश्वासियों को परिवार की तरह अपनाना।
नए नियम में अनेक कलीसियाएँ घरों में मिलती थीं।
- अक्विला और प्रिस्किल्ला का घर (रोमियों 16:3–5)
- नुम्फा का घर (कुलुस्सियों 4:15)
- फिलेमोन का घर (फिलेमोन 2)
- लुदिया का घर (प्रेरितों के काम 16:40)
घर केवल मिलने का स्थान नहीं था।
वह शिष्य बनाने की प्रयोगशाला था।
वहीं नए विश्वासी बढ़ते थे।
वहीं नए अगुवे तैयार होते थे।
वहीं से नई कलीसियाएँ जन्म लेती थीं।
प्रेरिताई कलीसिया की वृद्धि का रहस्य
प्रेरितों के काम 2 का अंतिम वाक्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है - "प्रभु प्रतिदिन उद्धार पाने वालों को उनकी मण्डली में मिला देता था।" (प्रेरितों के काम 2:47)
ध्यान दें —
उन्होंने वृद्धि बनाने का प्रयास नहीं किया।
उन्होंने शिष्य बनाने पर ध्यान दिया।
वृद्धि परमेश्वर ने दी।
आज भी यही सिद्धांत अपरिवर्तित है।
यदि हम कार्यक्रमों पर केन्द्रित होंगे, तो कुछ समय के लिए भीड़ एकत्र हो सकती है।
किन्तु यदि हम शिष्य बनाने पर केन्द्रित होंगे, तो परमेश्वर स्वयं अपनी कलीसिया की वृद्धि करेगा, क्योंकि यह उसकी योजना है।

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